अलिफ़-लाम-मीम(1)अल्लाह के नाम से जो बहुत मैहरबान, रहम करने वाला है,उस के सिवा कोई माबूद नहीं,हमेशा जिन्दा(सब का)संभालने वाला।(2)उस ने आप(स)पर किताब उतारी हक के साथ जो उस से पहली(किताब)की तसदीक करती है, और उस ने तौरेत और इनजील उतारी(3)उस से पहले लोगों की हिदायत के लिए, और उस ने फूरकान(हक को बातिल से जुदा करने वाला)उतारा, बेशक जिन्होंने अल्लाह की आयतों से इनकार किया उन के लिए सख्त अज़ाब है, और अल्लाह जबरदस्त है, बदला लेने वाला।(4)बेशक अल्लाह पर छुपी हुई नहीं कोई चीज़ ज़मीन में और न आस्मान में,(5)वही तो है जो तुम्हारी सूरत बनाता है माँ के रहम में जैसे वह चाहे,उस के सिवा कोई माबूद नहीं,जबरदस्त हिकमत वाला।(6)वही तो है जिस ने आप(स)पर किताब नाजिल की, उस में मुहक्कम(पुरूता)आयतें हैं वह किताब की असूल हैं, और दूसरी मुताशाबेह(कई मअने देने वाली),सो वह उस से मुताशाबिहात की पैरवी करते हैं, फसाद(गुमराही)की ग़र्ज़ से और उस का(ग़लत)मतलब ढून्डने की ग़र्ज से, और उस का मतलब अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता, और मजबूत(पुर्ता)इल्म वाले कहते हैं हम उस पर ईमान लाए सब हमारे रब की तरफ से है। और नहीं समझते मगर अक्ल वाले(सिर्फ अक्ल वाले समझते हैं)(7)ऐ हमारे रब! हमारे दिल न फेर इस के बाद जब कि तू ने हमें हिदायत दी और हमें इनायत फरमा अपने पास से रहमत, बेशक तू सब से बड़ा देने वाला है।(8)हमारे रब! बेशक तू लोगों को उस दिन जमा करने वाला है कोई शक नहीं जिस में, बेशक अल्लाह वादे के खिलाफ नहीं करता।(9)बेशक जिन लोगों ने कुफ्र किया, हरगिज न उन के माल उन के काम आएंगे और न उन की औलाद अल्लाह के सामने कुछ भी, और वही वह दोजख़ का इंधन हैं।(10)
जैसे फिरऔन वालों का मामला हुआ और वह जो उन से पहले थे, उन्होंने हमारी आयतों को झुटलाया तो अल्लाह ने उन्हें उन के गुनाहों पर पकड़ा, और अल्लाह सख़्त अज़ाब देने वाला है।(11)जिन लोगों ने कुफ्र किया उन्हें कह दें तुम अनकरीब मगलूब होगे और जहन्नम की तरफ हांके जाओगे, और वह बुरा ठिकाना है।(12)अलबत्ता तुम्हारे लिए उन दो गिरोहों में निशानी है जो बाहम मुकाबिल हुए, एक गिरोह लड़ता था अल्लाह की राह में और दूसरा काफिर था, वह उन्हें खुली आँखों से अपने से दो चन्द दिखाई देते थे, और अल्लाह अपनी मदद से जिसे चाहता है ताईद करता है, बेशक उस में देखने वालों(अक्लमन्दों)के लिए एक इब्रत है।(13)लोगों के लिए मरगूब चीज़ों की मुहब्बत खुशनुमा कर दी गई, मसलन औरतें और बेटे, और ढेर जमा किए हुए सोने और चाँदी के, और निशान ज़दा घोड़े, और मवेशी, और खेती, यह दुनिया की जिन्दगी का साज़ ओ सामान है, और अल्लाह के पास अच्छा ठिकाना है।(14)कह दें, क्या में तुम्हें इस से बेहतर बताऊँ? उन लोगों के लिए जो परहेजगार हैं, उन के रब के पास बाग़ात हैं जिन के नीचे नहरें जारी(रवां)हैं, वह उन में हमेशा रहेंगे, और पाक बीवियां और अल्लाह की खुशनूदी, और अल्लाह बन्दों को देखने वाला है।(15)जो लोग कहते हैं ऐ हमारे रब! बेशक हम ईमान लाए, सो हमें हमारे गुनाह बख़शदे और हमें दोजख के अजाब से बचा।(16)सब्र करने वाले और सच्चे, हुक्म बजा लाने वाले, खर्च करने वाले और बखशिश मांगने वाले रात के आख़िर हिससे में।(17)अल्लाह ने गवाही दी कि उस के सिवा कोई माबूद नहीं, और फरिश्तो और इल्म वालों ने(भी),(वही)हाकिम है इन्साफ के साथ, उस के सिवा कोई माबूद नहीं, जबरदस्त हिकमत वाला।(18)बेशक दीन अल्लाह के नज़दीक इसलाम है, और जिन्हें किताब दी गई(अहले किताब)ने इख़तिलाफ नहीं किया मगर उस के बाद जब कि उन के पास आ गया इल्म, आपस की जिद से, और जो अल्लाह की आयात(हुक्मों)का इनकार करे तो बेशक अल्लाह जल्द हिसाब लेने वाला है।(19)फिर अगर वह आप(स)से झगड़ें तो कह दें में ने अपना मुँह अल्लाह के लिए झुका दिया और जिस ने मैरी पैरवी की, और आप(स)अहले किताब और अनपढ़ों से कह दें क्या तुम इसलाम लाए? पस अगर वह इसलाम ले आए तो उन्होंने राह पा ली, और अगर वह मुँह फर लें तो आप पर सिर्फ पहुँचा देना है, और अल्लाह देखने वाला है(अपने)बन्दों को।(20)
बेशक जो लोग अल्लाह की आयतों का इनकार करते हैं और नबियों को कत्ल करते हैं नाहक, और उन्हें कत्ल करते हैं जो लोग इनसाफ का हुक्म करते हैं, सो उन्हें दर्दनाक अजाब की खुशखबरी दें।(21)यही वह लोग हैं जिन के अमल जाया हो गए दुनिया में और आखिरत में, और उन का कोई मददगार नहीं।(22)तुम ने उन लोगों को नहीं देखा जिन्हें दिया गया किताब का एक हिस्सा, वह अल्लाह की किताब की तरफ बुलाए जाते हैं ताकि वह उन के दरमियान फैसला करे, फिर उन का एक फ्रीक फिर जाता है, और वह मुँह फेरने वाले हैं।(23)यह इस लिए है कि वह कहते हैं हमें(दोज़ख़)की आग हरगिज़ न छुएगी मगर गिनती के चन्द दिन, और उन्हें उन के दीन(के बारे)में धौके में डाल दिया उस ने जो वह घड़ते थे।(24)सो क्या(हाल होगा)जब हम उन्हें उस दिन जमा करेंगे जिस में कोई शक नहीं, और हर शख्स पूरा पूरा पाएगा जो उस ने कमाया और उन की हक तलफी न होगी।(25)आप कहें ऐ अल्लाह!मालिके मुल्क तू जिसे चाहे मुल्क दे, तू मुल्क छीन ले जिस से तू चाहे, और तू जिसे चाहे इज्जत दे और जिसे चाहे जलील कर दे, तेरे हाथ में तमाम भलाई है, बेशक तू हर चीज़ पर कादिर है।(26)तू रात को दिन में दाखिल करता है और दाखिल करता है दिन को रात में, और तू बेजान से जानदार निकालता है और जानदार से बेजान निकालता है, और जिसे चाहे बेहिसाब रिज़क देता है।(27)मोमिन न बनाएं मौमिनों को छोड़ कर काफिरों को दोस्त, और जो ऐसा करे तो उस का अल्लाह से कोई तअल्लुक नहीं सिवाए इस के कि तुम उन से बचाव करो, और अल्लाह तुम्हें डराता है अपनी ज़ात से, और अल्लाह की तरफ लौट कर जाना है।(28)कह दें जो कुछ तुम्हारे दिलों में है अगर तुम छुपाओ या उसे जाहिर करो अल्लाह उसे जानता है, और वह जानता है जो कुछ आस्मानों में और जमीन में है, और अल्लाह हर चीज़ पर कादिर है।(29)जिस दिन हर शख्स(मौजूद) पाएगा जो उस ने की कोई नेकी, और जो उस ने कोई बुराई की। वह आरजू करेगा काश उस के दरमियान और उस(बुराई)के दरमियान दूर का फासला होता, और अल्लाह तुम्हें अपनी जात से डराता है, और अल्लाह शफकत करने वाला है बन्दों पर।(30)
आप कह दें अगर तुम अल्लाह से मुहब्बत रखते हो तो मेंरी पैरवी करो, अल्लाह तुम से
मुहब्बत करेगा और तुम्हारे गुनाह बख्श देगा, और अल्लाह बख्शने वाला रहम करने वाला है।(31)आप कह दें तुम इताअत करो अल्लाह की और रसूल की, फिर अगर वह फिर जाएं तो बेशक अल्लाह काफिरों को दोस्त नहीं रखता।(32)बेशक अल्लाह ने चुन लिया आदम(अ)और नूह(अ)को और इब्राहीम(अ)ओ इमरान के घराने को सारे जहान पर।(33)वह औलाद थे एक दूसरे की, और अल्लाह सुनने वाला,जानने वाला है।(34)जब इमरान की बीवी ने कहा ऐ मेरे रब!जो मेरे पेट में है, में ने तेरी नजर किया(सब से)आजाद रख कर, सो तू मुझ से कुबूल कर ले, बेशक तू सुनने वाला, जानने वाला है।(35)सो जब उस ने उस(मरयम)को जन्म दिया तो वह बोली ऐ मेरे रब! में ने जन्म दी है लड़की, और अल्लाह खूब जानता है जो उस ने जन्म दिया, और लड़का लड़की के मानिंद नहीं होता और में ने उस का नाम मरयम रखा, और में उस को और उस की औलाद को तेरी पनाह में देती हूँ शैतान मरदूद से|(36)तो उस को उस के रब ने अच्छी तरह कुबूल किया और उस को अच्छी तरह परवान चढ़ाया और ज़करिया(अ)को उस का कफील बनाया। जब भी जकरिया(अ)उस के पास हुजरे में दाखिल होते उस के पास खाना पाते,उस जकरिया(अ)ने कहा ऐ मरयम। यह तेरे पास कहां से आया? उस ने कहा यह अल्लाह के पास से है,बेशक अल्लाह जिसे चाहे बेहिसाब रिजूक देता है।(37)वहीं जकरिया(अ)ने अपने रब से दुआ की। ऐ मेरे रब!मुझे अपने पास से पाक औलाद क्षता कर, तू बेशक दुआ सुनने वाला है।(38)तो उन्हें आवाज़ दी फरिश्तो ने जब
वह हुजरे में खड़े हुए नमाज पढ़ रहे थे कि अल्लाह तुम्हें यहया(अ) की खुशखबरी देता है अल्लाह के कलिम की तसदीक् करने वाला, सरदार, और नफूस को काबू रखने वाला, और नबी(होगा)नेकोकारों में से।(39)उस ने कहा ऐ मेरे रब! मेरे लड़का कहां से होगा? जब कि मुझे बुढ़ापा पहुँच चुका है, और मेरी औरत बांझ है, उस ने कहा इसी तरह अल्लाह जो चाहता है करता है।(40)
उस ने कहा ऐ मेरे रब! मुकर्रर फरमा दे मेरे लिए कोई निशानी? उस ने कहा तेरी निशानी यह है कि तू लोगों से तीन दिन बात न करेगा मगर इशारे से, तू अपने रब को
बहुत याद कर, और सुबह औ शाम तसूबीह कर।(41)और जब फरिश्तो ने कहा ऐ मरयम! बेशक अल्लाह ने तुझ को चुन लिया और तुझ को पाक किया और तुझ को बरगुज़ीदा किया औरतों पर तमाम जहान की।(42)ऐ मरयम! तू अपने रब की फरमाबरदारी कर और सिजदा कर और रुकूअ कर रुकूअ करने वालों के साथ।(43)यह गैब की ख़बरें हैं, हम आप की तरफ वहि करते हैं, और आप उन के पास न थे जब वह कुरआ के लिए अपने कलम डाल रहे थे कि उन में से कौन मरयम की परवरिश करेगा? और आप(स)उन के पास न थे जब वह झगड़ते थे।(44)जब फरिश्तो ने कहा ऐ मरयम! बेशक अल्लाह तुझे अपने एक कलमे की बशारत देता है, उस का नाम मसीह(अ)ईसा(अ)इबने मरयम है, दुनिया और आखिरत में बाआबरू, और मुकर्रिबों से होगा,(45)और लोगों से गहवारे में और पुख्ता उम्र में बातें करेगा और नेकोकारों में से होगा।(46)वह बोली ऐ मेरे रब! मेरे हां बेटा कैसे होगा? और किसी मर्द ने मुझे हाथ नहीं लगाया, उस ने कहा इसी तरह अल्लाह जो चाहे पैदा करता है, जब वह किसी काम का इरादा करता है तो वह कहता है उस को “हो जा” सो वह हो जाता है।(47)और वह उस को सिखाएगा किताब और दानाई और तौरेत और इनजील।(48)और बनी इस्राईल की तरफ एक रसूल,(उस ने कहा)कि में तुम्हारी तरफ एक निशानी के साथ आया हूँ तुम्हारे रब की तरफ से, में तुम्हारे लिए गारे से परिन्दे जैसी शक्ल बनाता हूँ, फिर उस में फूंक मारता हूँ तो वह अल्लाह के हुक्म से परिन्दा हो जाता है, और में अच्छा करता हूँ
मादरज़ाद अन्धे और कोढ़ी को, और में अल्लाह के हुक्म से मुर्दे जिन्दा करता हूँ, और में तुम्हें बताता हूँ जो तुम खाते हो और जो तुम अपने घरों में जखीरा करते हो, बेशक उस मेँ तुम्हारे लिए एक निशानी है अगर तुम हो ईमान वाले।(49)और में अपने से पहली(किताब)तौरेत की तसदीक करने वाला हूँ और ताकि तुम्हारे लिए बाज़ वह चीज़ें हलाल कर दूँ जो तुम पर हराम की गई थीं, और तुम्हारे पास एक निशानी के साथ आया हूँ तुम्हारे रब से, सो तुम अल्लाह से डरो और मेरा कहा मानो।(50)
बेशक अल्लाह(ही)मेरा और तुम्हारा रब है, सो तुम उस की इबादत करो, यह सीधा रास्ता है।(51)फिर जब ईसा(अ)ने महसूस किया उन से कुफ्र(तो)कहा कौन है अल्लाह की तरफ मेरी मदद करने वाला? हवारियों ने कहा हम अल्लाह की मदद करने वाले हैं, हम अल्लाह पर ईमान लाए,और गवाह रह कि हम फरमाबरदार हैं,(52)ऐ हमारे रब! हम उस पर ईमान लाए जो तू ने नाज़िल किया और हम ने रसूल की पैरवी की, सो तू हमें गवाही देने वालों के साथ लिख ले।(53)उन्होंने मकर किया और अल्लाह ने खुफिया तदबीर की, और अल्लाह(सब)तदबीर करने वालों से बेहतर है।(54)जब अल्लाह ने कहा ऐ ईसा(अ): में तुझे कब्ज कर लूँगा और तुझे अपनी तरफ उठा लूँगा और तुझे पाक कर दूँगा उन लोगों से जिन्होंने कुफ्र किया, और जिन्होंने तेरी पैरवी की उन्हें ऊपर(ग़ालिब)रखूँगा उन के जिन््हों ने कुफ्र किया कयामत के दिन तक। फिर तुम्हें मेंरी तरफ लौट कर आना है, फिर में तुम्हारे दरमियान फैसला करूँगा जिस(बारे)में तुम इख़तिलाफ करते थे।(55)पस जिन लोगों ने कुफ्र किया, सो उन्हें सख्त अज़ाब दूँगा दुनिया और आखिरत में, और उन का कोई मददगार न होगा।(56)और जो लोग ईमान लाए और उन्होंने नेक काम किए तो (अल्लाह)उन के अजर उन्हें पूरे देगा, और अल्लाह दोस्त नहीं रखता जालिमों को।(57)हम आप(स)पर यह आयतें और हिकमत वाली नसीहत पढ़ते हैं।(58)बेशक अल्लाह के नजदीक ईसा(अ) की मिसाल आदम(अ)जैसी है, उसे मिट्टी से पैदा किया, फिर कहा उस को “हो जा” तो वह हो गया।(59)हक आप के रब की तरफ से है, पस शक करने वालों में से न होना।(60)
जो आप(स)से इस बारे में झगड़े उस के बाद जब कि आप के पास इल्म आगया तो आप(स)कह दें! आओ हम बुलाएं अपने बेटे और तुम्हारे बेटे, और अपनी औरतें और
तुम्हारी औरतें, और हम खुद और तुम खूद(भी), फिर हम सब इलतिजा करें, फिर झूटों पर अल्लाह की लानत भेजें।(61)बेशक यही सच्चा बयान है, और अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, और बेशक अल्लाह ही ग़ालिब, हिकमत वाला है।(62)फिर अगर वह फिर जाएं तो बेशक अल्लाह फसाद करने वालों को खूब जानता है।(63)आप(स)कह दें ऐ अहले किताब!उस एक बात पर आओ जो हमारे और तुम्हारे दरमियान बराबर (मुशतरिक)है कि हम अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करें और उस के साथ किसी को शरीक न ठहराएं और हम में से कोई किसी को न बनाए रब अल्लाह के सिवा, फिर अगर वह फिर जाएं तो तुम कह दो कि तुम गवाह रहो कि हम तो मुस्लिम(फरमाबरदार)हैं।(64)ऐ अहले किताब! तुम इब्राहीम(अ)के बारे में क्यों झगड़ते हो? और नहीं नाजिल की गई तौरेत और इन्जील मगर उन के बाद, तो क्या तुम अक्ल नहीं रखते।(65)हां!तुम वही लोग हो कि तुम ने उस(बारे)में झगड़ा किया जिस का तुम्हें इल्म था तो अब क्यों झगड़ते हो उस(बारे)में जिस का तुम्हें कुछ इल्म नहीं, और अल्लाह जानता है, और तुम नहीं जानते।(66) इब्राहीम(अ) न यहूदी थे न नसरानी,बलकि वह हनीफ(सब से रुख़ मोड़ कर अल्लाह के हो जाने वाले)मुस्लिम (फरमाबरदार)थे, और वह मुश्रिकों में से न थे।(67)बेशक सब लोगों से जियादा मुनासिबत है इब्राहीम(अ) से उन लोगों को जिन्होंने उन की पैरवी की, और इस नबी को और वह लोग जो ईमान लाए, और अल्लाह मोमिनों का कारसाज़ है।(68)अहले किताब की एक जमाअत चाहती है काश!वह तुम्हें गुमराह कर दें, और वह अपने सिवा किसी को गुमराह नहीं करते, और वह समझते नहीं।(69) ऐ अहले किताब! तुम क्यों इनकार करते हो अल्लाह की आयतों का। हालांकि तुम गवाह हो।(70)
ऐ अहले किताब! तुम क्यों मिलाते हो सच को झूट के साथ और तुम हक को छुपाते हो हालांकि तुम जानते हो।(71)और एक जमाअत ने कहा अहले किताब की कि जो कुछ मुसलमानों पर नाजिल किया गया है, उसे दिन के अव्वल हिस्से में मान लो और मुन्किर हो जाओ उस के आख़िर हिस्से में(शाम को) शायद कि वह फिर जाएं।(72)और तुम(किसी की बात) न मानो सिवाए उस के जो पैरवी करे तुम्हारे दीन की, आप(स) कह दें बेशक हिदायत अल्लाह ही की हिदायत है कि किसी को दिया गया जैसा कि तुम्हें
दिया गया था, या वह तुम से तुम्हारे रब के सामने हुज्जत करें, आप(स)कह दें, बेशक फज्ल अल्लाह के हाथ में है, वह देता है जिस को वह चाहता है, और अल्लाह वुसअत
वाला, जानने वाला है।(73) वह जिस को चाहता है अपनी रहमत से ख़ास कर लेता है, और अल्लाह बड़े फज़्ल वाला है।(74) और अहले किताब में कोई ऐसा है कि अगर आप(स)उस के पास अमानत रखें ढेरों माल तो वह आप (स) को अदा करदे, और उन में
से कोई ऐसा है अगर आप उस के पास एक दीनार अमानत रखें तो वह अदा न करे मगर जब तक आप(स) उस के सर पर खड़े रहें,यह इस लिए है कि उन्होंने कहा हम पर उममियों के(बारे) में (इलज़ाम की) कोई राह नहीं, और वह अल्लाह पर झूट बोलते हैं,
और वह जानते हैं।(75) क्यों नहीं? जो कोई अपना इकरार पूरा करे और परहेज़गार रहे तो बेशक अल्लाह परहेजगारों को दोस्त रखता है।(76)बेशक जो लोग अल्लाह के अहद और अपनी कस्मों से हासिल करते हैं थोड़ी कीमत, यही लोग हैं जिन के लिए आखिरत में कोई हिस्सा नहीं और न अल्लाह उन से कलाम करेगा और न उन की तरफ नज़र करेगा क्यामत के दिन और न उन्हें पाक करेगा, और उन के लिए दर्दनाक अज़ाब है।(77)बेशक उन मे एक फरीक है जो किताब पढ़ते वक़्त अपनी जबानें मरोड़ते हैं, ताकि तुम समझो कि वह किताब से है, हालांकि वह किताब से नहीं होता, और वह कहते हैं कि वह अल्लाह की तरफ से है, हालांकि वह नहीं अल्लाह की तरफ से,और अल्लाह पर झूट बोलते हैं और वह जानते हैं।(78) किसी आदमी के लिए यह शायान नहीं कि अल्लाह उसे किताब और हिकमत और नुबूवत अता करे, फिर वह लोगों को कहे कि तुम अल्लाह के बजाए मेरे बन्दे हो जाओ, लेकिन वह यहि कहेगा कि तुम अल्लाह वाले हो जाओ,इस लिए कि तुम किताब सिखाते हो और तुम खुद भी पढ़ते हो।(79) और न वह तुम्हें हुक्म देगा कि तुम फरिश्तो और नबियाँ को परवरदिगार ठहराओ,क्या वह तुम्हें हुक्म देगा कुफ्र का! इस के बाद कि तुम मुसलमान (फरमाबरदार) हो चुके।(80)
और जब अल्लाह ने अहद लिया नबियों से कि जो कुछ में तुम्हें किताब और हिकमत दूँ, फिर तुम्हारे पास रसूल आए उस की तसदीक करता हुआ जो तुम्हारे पास है तो तुम उस पर ज़रूर ईमान लाओगे, और जरूर उस की मदद करोगे, उस ने फरमाया क्या तुम ने इकरार किया और तुमने इस पर मेरा अहद कुबूल किया? उन्होंने कहा कि हम ने इकरार
किया, उस ने फरमाया पस तुम गवाह रहो और में तुम्हारे साथ गवाहों में से हूँ।(81)फिर जो इस के बाद फिर जाए तो वही नाफरमान हैं।(82)क्या वह अल्लाह के दीन के सिवा कोई और दीन चाहते हैं। और उसी का फरमाबरदार है जो आस्मानों और जमीन में है, चार ओ नाचार, और उसी की तरफ वह लौटाए जाएंगे।(83)कह दें हम ईमान लाए अल्लाह पर, और जो हम पर नाज़िल किया गया और जो नाजिल किया गया
इब्राहीम(अ), इस्माईल(अ), इसहाक(अ), याकूब(अ) और उन की औलाद पर, और जो दिया गया मूसा(अ)और ईसा(अ)और नबियों को उन के रब की तरफ से,हम फर्क नहीं करते उन में से किसी एक के दरमियान, और हम उसी के फरमाबरदार हैं।(84)और जो कोई चाहेगा इसलाम के सिवा कोई और दीन तो उस से हरगिज़ कुबूल न किया जाएगा, और वह आख़िरत में नुकसान उठाने वालों में से होगा।(85)अल्लाह ऐसे लोगों को क्योंकर हिदायत देगा जो काफिर हो गए अपने ईमान के बाद और गवाही
चुके कि यह रसूल सच्चे हैं,और उन के पास खुली निशानियां आ गईं, और अल्लाह ज़ालिम लोगों को हिदायत नहीं देता।(86)ऐसे लोगों की सज़ा है कि उन पर लानत है अल्लाह की और फरिश्तो की और तमाम लोगों की।(87)वह उस में हमेशा रहेंगे। न उन से अजाब हलका किया जाएगा और न उन्हें मुहूलत दी जाएगी।(88)मगर जिन लोगों ने इस के बाद तौबा की और इसलाह की, तो बेशक अल्लाह बख्शने वाला, रहम करने वाला है।(89)बेशक जो लोग काफिर हो गए अपने ईमान के बाद, फिर बढ़ते गए कुफ्र में, उन की तौबा हरगिज न कुबूल की जाएगी, और वही लोग गुमराह हैं।(90)
बेशक जिन लोगों ने कुफ्र किया और वह मर गए हालते कुफ्र मे तो हरगिज़ न कुबूल किया जाएगा उन में से किसी से जमीन भर सोना भी,अगरचे वह उस को बदले में दे, यही लोग हैं उन के लिए दर्दनाक अजाब है और उन के लिए कोई मददगार नहीं।(91) तुम हरगिज नेकी को न पहुँचोगे जब तक उस मे से खर्च न करो जिस से तुम मुहब्बत रखते हो, और जो तुम ख़र्च करोगे कोई चीज तो बेशक अल्लाह उस को जानने वाला है।(92) तमाम खाने हलाल थे बनी इस्राईल के लिए, मगर जो याकूब(अ) ने अपने आप पर हराम कर लिया था उस से कब्ल कि तौरेत उतरे,आप कह दें कि तुम तौरेत लाओ, फिर उस को पढ़ो अगर तुम सच्चे हो।(93)फिर जो कोई अल्लाह पर इस के बाद झूट बाँधे तो वही लोग ज़ालिम हैं।(94)आप कह दें अल्लाह ने सच फरमाया, पस तुम इब्राहीम हनीफ(एक के हो जाने वाले)के दीन की पैरवी करो और वह मुश्रिकों में से न थे।(95)बेशक सब से पहले जो घर मुकर्रर किया गया लोगों के लिए वह जो मक्का में है बरकत वाला और सारे जहानों के लिए हिदायत।(96)उस में निशानियां हैं खुली जैसे मुकामे इब्राहीम(अ) और जो उस में दाखिल हुआ वह अमन में हो गया, और अल्लाह के लिए (अल्लाह का हक है) लोगों पर ख़ानाए कअबा का हज करना जो उस की तरफ राह( चलने की) इसतिताअत रखता हो, और जिस ने कुफ्र किया तो बेशक अल्लाह जहान वालों से बेनियाज़ है।(97) आप(स)कह दें: ऐ अहले किताब! क्यों तुम अल्लाह की आयतों का इनकार करते हो? और अल्लाह उस पर गवाह है(बाख़बर है)जो तुम करते हो।(98)आप(स)कह दें: ऐ अहले किताब! तुम अल्लाह के रास्ते से क्यों रोकते हो(उस को)जो अल्लाह पर ईमान लाए, तुम उस में कजी ढूंडते हो, और तुम खुद गवाह हो, और अल्लाह उस से बेख़बर नहीं जो तुम करते हो।(99)ऐ वह लोगो जो ईमान लाए हो (ऐ ईमान वालो!)अगर कहा मानोगे उन लोगों के एक फरीक का जिन्हें किताब दी गई(अहले किताब)वह तुम्हारे ईमान लाने के बाद तुम्हें (हालते)कुफ्र में फेर देंगे।(100)
और तुम कैसे कुफ्र करते हो जबकि तुम पर अल्लाह की आयते पढ़ी जाती हैं और तुम्हारे दरमियान उस का रसूल(स) मौजूद है, और जो कोई मजबूती से पकड़ेगा अल्लाह की रस्सी को तो उसे सीधे रास्ते की तरफ हिदायत दी गई।(101)ऐ वह लोगो जो ईमान लाए हो! अल्लाह से डरो जैसा कि उस से डरने का हक है और तुम हरगिज न मरना मगर(उस हाल में) कि तुम मुसलमान हो।(102)और मजबूती से पकड़ लो अल्लाह की रस्सी को सब मिल कर और आपस में फूट न डालो, और अपने ऊपर अल्लाह की नेमत को याद करो, जब तुम एक दूसरे के दुश्मन थे तो उस ने तुम्हारे दिलों में उलफत डाल दी तो तुम उस के फज़्ल से भाई भाई हो गए, और तुम आग के गढ़े के किनारे पर थे तो उस ने तुम्हें उस से बचा लिया, इसी तरह वह तुम्हारे लिए अपनी आयात वाज़ेह करता है ताकि तुम हिदायत पाओ।(103)और चाहिए कि तुम में से एक जमाअत रहे, वह भलाई की तरफ बुलाए और अच्छे कामों का हुक्म दे और बुराई से रोके, और यही लोग कामयाब होने वाले हैं।(104)और उन लोगों की तरह न हो जाओ जो मुत्फर्रिक हो गए और बाहम इख़तिलाफ करने लगे उस के बाद कि उन के पास वाज़ेह हुक्म आगए, और यही लोग हैं जिन के लिए है अज़ाब बहुत बड़ा।(105)जिस दिन बाज़ चेहरे सफ़ेद होंगे और बाज चेहरे सियाह होंगे, पस जिन लोगों के सियाह हुए चेहरे उन से कहा जाएगा क्या तुम ने अपने ईमान के बाद कुफ्र किया। तो अब अज़ाब चखो क्यों कि तुम कुफ्र करते थे।(106)और अलबत्ता जिन लोगों के चेहरे सफेद होंगे वह अल्लाह की रहमत में होंगे, वह उस में हमेशा रहेंगे।(107) यह अल्लाह की आयात हैं, हम आप पर ठीक ठीक पढ़ते हैं, और अल्लाह जहान वालों पर कोई जुल्म नहीं चाहता।(108)और अल्लाह के लिए है जो आस्मानों और जमीन में है, और तमाम काम अल्लाह की तरफ लौटाए जाएंगे।(109)तुम बेहतरीन उम्मत हो जो लोगों के लिए भेजी गई(पैदा की गई)तुम अच्छे कामों का हुक्म करते हो और बुरे कामों से मना करते हो और अल्लाह पर ईमान लाते हो, और अगर अहले किताब ईमान ले आते तो उन के लिए बेहतर था, उन में कुछ ईमान वाले हैं और उन में से अक्सर नाफरमान हैं।(110)
वह सताने के सिवा तुम्हारा हरगिज़ कुछ न बिगाड़ सकेंगे, और अगर वह तुम से लड़ेंगे तो वह तुम्हें पीठ दिखाएंगे, फिर उन की मदद न होगी(111)उन पर जिल्लत चस्पा कर दी गई जहां कहीं वह पाए जाएं सिवाए उस के कि अल्लाह के अहद में आ जाएं और लोगों के अहद में, वह लौटे अल्लाह के ग़ज़ब के साथ और उन पर चस्पा कर दी गई मोहताजी, यह इस लिए कि वह अल्लाह की आयात का इनकार करते थे और नबियों को नाहक कतल करते थे, यह इस लिए था कि उन्होंने नाफरमानी की और वह हद से बढ़ जाते थे।(112)अहले किताब में सब बराबर नहीं, एक जमाअत सीधी राह पर काइम है और रात के औकात में अल्लाह की आयात पढ़ते हैं और वह सिजदा करते हैं।(113)वह ईमान रखते हैं अल्लाह पर और आखिरत के दिन पर और वह अच्छी बात का हुक्म करते हैं और
बुरे काम से रोकते हैं और वह नेक कामों में दौड़ते हैं,और यही लोग नेकोकारों में से हैं।(114)और वह जो करेंगे कोई नेकी तो हरगिज़ उस की नाकद्री न होगी, और अल्लाह परहेजगारों को जानने वाला है।(115)बेशक जिन लोगों ने कुफ्र किया, हरगिज अल्लाह के आगे उन के माल और न उन की औलाद कुछ भी काम आएंगे, और यही लोग दोजख़ वाले हैं, वह उस में हमेशा रहेंगे।(116)उन की मिसाल जो ख़र्च करते हैं इस दुनिया में ऐसी है जैसे हवा हो, उस में पाला हो, वह जा लगे खेती को उस कौम की जिनहोने अपनी जानों पर जुल्म किया, फिर उस को तबाह कर दे, अल्लाह ने उन पर जुल्म नहीं किया बलकि वह अपनी जानों पर खुद जुल्म करते हैं।(117)ऐ ईमान वालो! अपनों के सिवा किसी को राज़दार न बनाओ, वह तुम्हारी ख़राबी में कमी नहीं करते, वह चाहते हैं कि तुम तकलीफ पाओ, उन की दुश्मनी जाहिर हो चुकी है उन के मुँह से, और जो उन के सीनों में छुपा हुआ है वह उस से भी बड़ा है, हम ने तुम्हारे लिए आयात खोल कर बयान कर दी हैं अगर तुम अक़्ल रखते हो।(118)सुन लो! तुम वह लोग हो जो उन को दोस्त रखते हो और वह तुम्हें दोस्त नहीं रखते और तुम सब किताबों पर ईमान रखते हो, और
जब तुम से मिलते हैं तो कहते हैं हम ईमान लाए, और जब अकेले होते हैं तो वह तुम पर गुस्से से उंगलियां चबाते हैं, कह दीजिए! तुम अपने गुस्से में मर जाओ, बेशक अल्लाह दिल की बातों को (खूब)जानने वाला है।(119)अगर तुम्हें कोई भलाई पहुँचे तो उन्हें बुरी लगती है, और अगर तुम्हें कोई बुराई पहुँचे तो वह उस से खुश होते हैं,और अगर तुम सब्र करो और परहेज़गारी करो, तुम्हारा न बिगाड़ सकेगा उन का फरेब कुछ भी,बेशक जो कुछ वह करते हैं अल्लाह उसे घेरे हुए है।(120)
और जब आप सुबह सवेरे निकले
अपने घर से, मोमिनों को जंग के
मोर्चो पर बिठाने लगे, और अल्लाह
सुनने वाला जानने वाला है।(121)जब तुम में से दो गिरोहों ने इरादा किया कि हिम्मत हार दें, और अल्लाह उन का मददगार था, और अल्लाह पर चाहिए कि मोमिन
भरोसा करें।(122)और अलबत्ता अल्लाह तुम्हारी बद्र में मदद कर चुका है जबकि
तुम कमजोर समझे जाते थे, तो अल्लाह से डरो ताकि तुम
शुक्रगुजार हो।(123)जब आप मोमिनों को कहते थे क्या
तुम्हारे लिए यह काफी नहीं कि
तुम्हारा रब तुम्हारी मदद करे तीन
हजार फरिश्तो से उतारे हुए।(124)क्यों नहीं अगर तुम सब्र करो और
परहेजगारी करो, और दुश्मन
तुम पर चढ़ आएं तो फौरन तुम्हारा
रब तुम्हारी मदद करेगा पाँच हज़ार निशान जदा फरिश्तो से।(125)और यह अल्लाह ने सिर्फ तुम्हारी खुशख़बरी के लिए किया और इस लिए कि उस से तुम्हारे दिलों को
इतमीनान हो, और नहीं मदद मगर
(सिर्फ)अल्लाह के पास से है जो
ग़ालिब, हिकमत वाला है।(126)ताकि वह उन लोगों के एक गिरोह
को काट डाले जिन्होंने कुफ्र किया
या उन्हें जलील कर दे तो वह
नामुराद लौट जाएं।(127)आप(स)का इस में दखल नहीं कुछ भी, ख़ाह(अल्लाह)उन की तौबा कूबूल करे या उन्हें अज़ाब दे
क्योंकि वह जालिम हैं।(128)और अल्लाह ही के लिए है जो आस्मानों में और जो जमीन में है,
और जिस को चाहे बख्श दे और
अज़ाब दे जिस को चाहे, और अल्लाह बखशने वाला मैहरबान है।(129)ईमान वालो! न खाओ सूद दुगना चौगना, और अल्लाह से डरो ताकि
तुम फलाह पाओ।(130)
और डरो उस आग से जो काफिरों
के लिए तैयार की गई है।(131)और तुम अल्लाह और रसूल(स)का हुक्म मानो ताकि तुम पर रहम किया जाए।(132)और दौड़ो अपने रब की बखशिश
और जन्नत की तरफ जिस का अर्ज
आस्मानों और ज़मीन(के बराबर)
है, तैयार की गई है परहेज़गारों के
लिए।(133)जो खर्च करते हैं खुशी(खुशहाली)
और तकलीफ में और पी जाते हैं
गुस्सा और माफ कर देते हैं लोगों
को, और अल्लाह दोस्त रखता है
एहसान करने वालों को।(134)और वह लोग जो बेहयाई करें या
अपने तईं कोई जुल्म कर बैठें तो
वह अल्लाह को याद करें, फिर
अपने गुनाहों के लिए बख्शिश
मांगें, और कौन गुनाह बखशता है
अल्लाह के सिवा? और जो उन्होंने
ग़लत किया उस पर जानते बूझजे
न अड़ें।(135)ऐसे ही लोगों की जज़ा उन के रब की तरफ से बक्शीश और बाग़ात हैं जिन के नीचे बहती हैं नहरें, वह उन में हमेशा रहेंगे, और कैसा
अच्छा बदला है काम करने वालों
का!(136)गुजर चुके हैं तुम से पहले तरीके
(वाकिआत)तो जमीन में चलो
फिरो, फिर देखो कैसा अनजाम
हुआ झुटलाने वालों का!(137)यह बयान है लोगों के लिए और
हिदायत और नसीहत परहेजगारों
के लिए।(138)और तुम सुस्त न पड़ो और ग़म न
खाओ, और तुम ही ग़ालिब रहोगे
अगर तुम ईमान वाले हो।(139)अगर तुम को जखम पहुँचा तो
अलबत्ता पहुँचा है उस कौम को भी
उस जैसा ही जख्म, और यह खुशी
और गम के दिन हैं जो हम लोगों के
दरमियान बारी बारी बदलते रहते हैं,
और ताकि अल्लाह मालूम कर ले उन
लोगों को जो ईमान लाए और तुम में
से बाज़ को शहीद बनाए(दरजए
शहादत दे), और अल्लाह जालिमों
को दोस्त नहीं रखता।(140)
और ताकि अल्लाह पाक साफ
कर दे उन लोगों को जो ईमान लाए
और मिटा दे काफिरों को।(141)क्या तुम यह समझते हो कि तुम
जन्नत में दाखिल हो जाओगे और
अभी अल्लाह ने मालूम नहीं किया
(इम्तिहान नहीं लिया)कि कौन
तुम में से जिहाद करने वाले हैं और
सब्र करने वाले हैं।(142)और अलबत्ता तुम मौत से मिलने
से कब्ल उस की तमन्ना करते
थे, तो अब तुम ने उसे(मौत को)
देख लिया और तुम उसे अपनी
आँखों से देख रहे हो।(143)और मुहम्मद(स) तो एक रसूल है,अलबत्ता गुजर चुके हैं उन से पहले बहुत से रसूल, फिर अगर वह
वफात पा लें या कतल हो जाएं तो
क्या तुम अपनी एड़ियों पर उलटे
पाऊँ लौट जाओगे? और जो अपनी
एड़ियों पर उलटे पाऊँ फिर जाए
तो वह हरगिज़ अल्लाह का कुछ न
बिगाड़ेगा, और अल्लाह जलद जज़ा
देगा शुक्र करने वालों को (144)और किसी शख्स के लिए(मुमकिन)
नहीं कि वह अल्लाह के हुक्म के
बगैर मर जाए, लिखा हुआ है एक
मुकर्रर वक़्त, और जो दुनिया का
इनआम चाहेगा हम उसे उस में से
दे देंगे, और जो चाहेगा आखिरत
का बदला हम उसे उस में से देंगे,
और हम शुक्र करने वालों को
जलद जज़ा देंगे।(145)और बहुत से नबी हुए हैं उन के
साथ(मिल कर)बहुत से अल्लाह
वाले लड़े, पस वह सुस्त न पड़े
उन मुसीबतों के सबब जो उन्हें
अल्लाह की राह में पहुँची और न
उन्होंने कमजोरी(जाहिर)की और
न दब गए, और अल्लाह सब्र करने
वालों को दोस्त रखता है।(146)और उन का कहना न था उस के सिवाए कि उन्होंने दुआ कीः ऐ हमारे रब! हमें बख्शदे हमारे
गुनाह, और हमारी जियादती हमारे
काम में, और साबित रख हमारे
कदम और काफिरों की कौम पर
हमारी मदद फरमा।(147)तो अल्लाह ने उन्हें इनाम दिया
दुनिया का और आखिरत का अच्छा
इनाम, और अल्लाह एहसान करने
वालों को दोस्त रखता है।(148)ऐ ईमान वालो! अगर तुम काफिरों
का कहा मानोगे तो वह तुम्हें
एड़ियों पर(उलटे पाऊँ)फेर देंगे
फिर तुम घाटे में पलट
जाओगे।(149)बल्कि अल्लाह तुम्हारा मददगार है
और वह सब से बेहतर मददगार
है।(150)
हम अनकरीब काफिरों के दिलों में
डाल देंगे इस लिए कि उन्होंने अल्लाह का शरीक किया जिस
की उस ने कोई सनद नहीं उतारी,
और उन का ठिकाना दोज़ख़ है,
और बुरा ठिकाना है ज़ालिमों का।(151)और अलबत्ता अल्लाह ने तुम से
अपना वादा सच्चा कर दिखाया
जब तुम उन्हें उस के हुक्म से
कतल करने लगे यहां तक कि जब
तुम ने बुज़दिली की और काम में
झगड़ा किया और उस के बाद
नाफरमानी की जबकि तुम्हें दिखाया
जो तुम चाहते थे, तुम में से कोई
दुनिया चाहता था और तुम में से
कोई आखिरत चाहता था, फिर
उस ने तुम्हें उन से पस्पा कर दिया
ताकि तुम्हें आजमाएं, और तहकीक
उस ने तुम्हें माफ कर दिया, और
अल्लाह मोमिनों पर फज़्ल करने
वाला है।(152)जब तुम(मुँह उठा कर)चढ़ते जाते
थे और किसी को पीछे मुड़ कर न देखते थे और रसूल(स) तुम्हारे
पीछे से तुम्हें पुकारते थे, फिर तुम्हें
ग़म पर गरम पहुँचा ताकि तुम रंज
न करो उस पर जो तुम्हारे हाथ
से निकल गया और न उस पर
जो तुम्हें पेश आए, और अल्लाह
उस से बाख़बर है जो तुम करते
हो।(153) फिर उस ने तुम पर ग़म के बाद
अमन ऊंघ की सूरत में उतारी,
एक जमाअत को ढाँक लिया तुम
में से, और एक जमाअत को
अपनी जान की फिक्र पड़ी थी, वह अल्लाह के बारे में बे हकीकत
गुमान करते थे जाहिलियत के
गुमान, वह कहते थे क्या कोई
काम कुछ हमारे लिए(हमारे
इखतियार में)है? आप(स)कह दें कि तमाम काम अल्लाह के लिए
(अल्लाह के इख़तियार में)है, वह
अपने दिलों में छुपाते हैं जो आप के
लिए(आप पर)जाहिर नहीं करते,
वह कहते हैं अगर कुछ काम हमारे
लिए(हमारे इख़तियार में)होता तो हम यहां न मारे जाते, आप
कह दें अगर तुम अपने घरों में
होते तो जिन पर(जिन की किस्मत
में)मारा जाना लिखा था वह जरूर
निकल खड़े होते अपनी कतलगाहों
की तरफ, ताकि अल्लाह आज़माए
जो तुम्हारे सीनों में है, और ताकि
साफ कर दे जो तुम्हारे दिलों में है, और अल्लाह दिलों के भेद खूब
जानने वाला है।(154)बेशक जो लोग तुम में से पीठ फेर गए जिस दिन दो जमाअतें आमने सामने हुईं, दरहकीकत उन्हें शैतान
ने फिसलाया उन के बाज़ आमाल की
वजह से, और अलबत्ता अल्लाह ने
उन्हें माफ कर दिया, बेशक अल्लाह
बखशने वाला बुर्दबार है।(155)ऐ ईमान वालो! तुम उन लोगों की
तरह न हो जाओ जो काफिर हुए
और वह कहते हैं अपने भाइयों को
जब वह सफर करें जमीन में या जंग
में शरीक हों, अगर वह होते हमारे
पास तो वह न मरते और न मारे
जाते, ताकि अल्लाह उस को हसरत
बना दे उन के दिलों में, और
अल्लाह(ही)जिन्दा करता है और
मारता है, और तुम जो कुछ करते
हो अल्लाह देखने वाला है।(156)और अगर तुम अल्लाह की राह में
मारे जाओ या तुम मर जाओ तो
यकीनन बखशिश और रहमत है
अल्लाह की तरफ से,(यह)उस
से बेहतर है जो वह(दौलत)जमा
करते हैं।(157)और अगर तुम मर गए या मार
दिए गए तो यकीनन अल्लाह की
तरफ इकटठे किए जाओगे।(158)पस अल्लाह की रहमत(ही)से है
कि आप(स)उन के लिए नरम दिल
हैं, और अगर तुन्दखू सख़्त दिल
होते तो वह आप(स) के पास से
मुन्तशिर हो जाते, पस आप(स)
माफ कर दें उन्हें और उन के लिए बखशिश मांगें, और काम में उन
से मशवरा कर लिया करें, फिर
जब आप(स)(पुख्ता)इरादा कर
लें तो अल्लाह पर भरोसा करें,
बेशक अल्लाह भरोसा करने वालों
को दोस्त रखता है।(159)अगर अल्लाह तुम्हारी मदद करे तो
तुम पर कोई ग़ालिब आने वाला
नहीं, और अगर वह तुम्हें छोड़ दे तो
कौन है जो तुम्हारी मदद करे उस के बाद, और चाहिए कि ईमान वाले
अल्लाह पर भरोसा करें।(160)
और नबी के लिए शायान नहीं
कि वह छुपाए, और जो छुपाएगा
वह अपनी छुपाई हुई चीज़ कियामत
के दिन लाएगा, फिर पूरा पूरा
पाएगा हर शख्स जो उस ने कमाया
(अमल किया)और वह जुल्म नहीं
किए जाएंगे।(161)तो क्या जिस ने पैरवी की रजाए
इलाही(अल्लाह की खुशनूदी की)
उस के मानिन्द है जो अल्लाह के
गुस्से के साथ लौटा और उस का
ठिकाना जहनम है, और बहुत
बुरा ठिकाना है।(162)उन के(मुख़तलिफ)दरजे हैं अल्लाह
के पास, और वह जो कुछ करते हैं
अल्लाह देखने वाला है।(163)बेशक अल्लाह ने ईमान वालों
(मोमिनों)पर एहसान किया जब उन
में एक रसूल(स)भेजा उन में से,
वह उन पर उस की आयते पढ़ता है,
और उन्हें पाक करता है, और उन्हें
किताब ओ हिकमत सिखाता है, और
बेशक वह उस से कब्ल अलबत्ता
खुली गुमराही में थे।(164)क्या जब तुम्हें पहुँची कोई मुसीबत,
अलबत्ता तुम उस से दो चंद पहुँचा
चुके थे, तुम कहते हो यह कहां से
आई? आप कह दें वह तुम्हारे अपने
(ही)पास से, बेशक अल्लाह हर
चीज़ पर कादिर है।(165)और तुम्हें जो(तकलीफ)पहुँची
जिस दिन दो जमाअतों में मुठभेड़
हुईं तो अल्लाह के हुक्म से(पहुँची)
ताकि वह मालूम कर ले ईमान
वालों को।(166)और ताकि जान ले उन लोगों
को जो मुनाफिक हुए, और उन्हें
कहा गया: आओ। अल्लाह की
राह में लड़ो या दिफाअ करो, तो
वह बोले अगर हम जंग जानते
तो जरूर तुम्हारा साथ देते, वह
उस दिन कुफ्र से जियादा करीब
थे ब निसबत ईमान के, वह अपने
मुँह से कहते हैं जो उन के दिलों
में नहीं, और अल्लाह खूब जानने
वाला है जो वह छुपाते हैं।(167)वह लोग जिन्होंने अपने भाइयों
के बारे में कहा और खुद बैठे रहे अगर वह हमारी बात मानते तो वह न मारे जाते, कह दीजिए! तुम अपनी जानों से मौत को हटा दो
अगर तुम सच्चे हो।(168)जो लोग अल्लाह की राह में मारे गए
उन्हें हरगिज़ ख़याल न करो मुर्दा,
बलकि वह जिन्दा हैं अपने रब के
पास से वह रिजक पाते हैं।(169)खुश हैं उस से जो अल्लाह ने उन्हें
अपने फज़्ल से दिया, और वह उन
लोगों की तरफ से खुश वक़्त हैं जो
नहीं मिले उन से उन के पीछे, उन
पर न कोई खौफ है और न वह
ग़मगीन होंगे।(170)
वह खुशियां मना रहे हैं अल्लाह की
नेमत और फज़्ल से, और यह कि
अल्लाह जाया नहीं करता ईमान
वालों का अजर।(171)जिन लोगों ने अल्लाह और उस
के रसूल का हुक्म कुबूल किया
उस के बाद कि उन्हें जख्म पहुँचा,
उन में से जिन लोगों ने नेकी और
परहेजगारी की उन के लिए बड़ा
अजर है।(172)जिन्हें लोगों ने कहा कि लोगों ने
तुम्हारे मुकाबले के लिए सामान
जमा कर लिया है, पस उन से डरो
तो उन का ईमान जियादा हुआ,
और उन्होंने कहा हमारे लिए अल्लाह काफी है और वह कैसा
अच्छा कारसाज़ है!(173)फिर वह लौटे अल्लाह की नेमत
और फज्ल के साथ, उन्हें कोई
बुराई न पहुँची, और उन्होंने
पैरवी की रजाए इलाही की, और
अल्लाह बड़े फज़्ल वाला है।(174) इस के सिवा नहीं कि शैतान तुम्हें
डराता है अपने दोस्तों से, सो तुम
उन से न डरो और मुझ से डरो
अगर तुम ईमान वाले हो।(175)और आप को ग़मगीन न करें वह
लोग जो कुफ्र में दौड़ धूप करते
हैं, यकीनन वह हरगिज़ अल्लाह
का न बिगाड़ सकेंगे कुछ, अल्लाह
चाहता है कि उन को आखिरत में
कोई हिस्सा न दे, और उन के लिए
अजाब है बड़ा।(176)बेशक जिन लोगों ने ईमान के बदले
कुफ्र मौल लिया वह हरगिज नहीं
बिगाड़ सकते अल्लाह का कुछ, और
उन के लिए दर्दनाक अज़ाब है।(177)और जिन लोगों ने कुफ्र किया वह
हरगिज़ गुमान न करें कि हम जो
उन्हें ढील दे रहे हैं यह उन के लिए
बेहतर है, दरहकीकत हम उन्हें
ढील देते हैं ताकि वह गुनाह में बढ़ जाएं, और उन के लिए ज़लील
करने वाला अज़ाब है।(178)अल्लाह ऐसा नहीं है कि ईमान
वालों को इस हाल पर छोड़ दे
जिस पर तुम हो यहां तक कि
नापाक को पाक से जुदा कर दे,
और अल्लाह ऐसा नहीं है कि तुम्हें
गैब की ख़बर दे, लेकिन अल्लाह
अपने रसूलों में से जिस को चाहे
चुन लेता है, तो तुम अल्लाह और
उस के रसूलों पर ईमान लाओ,
और अगर तुम ईमान लाओ और
परहेजगारी करो तो तुम्हारे लिए
बड़ा अजर है।(179)और वह लोग हरगिज़ यह ख़याल
न करें जो उस माल में बुखल
करते हैं जो अल्लाह ने अपने फज्ल
से उन्हें दिया कि वह बेहतर है उन
के लिए, बलकि वह उन के लिए
बुरा है, जिस माल में उन्होंने
बुख़ल किया अनकरीब क्यामत के दिन तौक बना कर पहनाया
जाएगा, और अल्लाह ही वारिस है
आस्मानों का और ज़मीन का, और
जो तुम करते हो अल्लाह उस से बाख़बर है।(180)
अलबता अल्लाह ने उन की बात
सुन ली जिन लोगों ने कहा कि
अल्लाह फकीर है और हम मालदार
हैं। अब हम लिख रखेंगे जो उन्होंने कहा और उन का नबियों को
नाहक कतल करना और कहेंगे:
चखो जलाने वाला अज़ाब।(181)यह उस का बदला है जो तुम्हारे
हाथों ने आगे भेजा और यह कि
अल्लाह बन्दों पर जुल्म करने वाला
नहीं।(182)जिन लोगों ने कहा कि अल्लाह ने
हम से अहद कर रखा है कि हम
किसी रसूल पर ईमान न लाएं यहां
तक कि वह हमारे पास कुरबानी
लाए जिसे आग खा ले, आप(स)
कह दें अलबत्ता तुम्हारे पास मुझ
से पहले बहुत से रसूल आए
निशानियों के साथ और उस के
साथ भी जो तुम कहते हो, फिर
क्यों तुम ने उन्हें कतल किया अगर
तुम सच्चे हो,(183)फिर अगर वह आप को झुटलाएं
तो अलबत्ता झुटलाए गए हैं आप(स)से पहले बहुत से रसूल
जो आए खुली निशानियों के साथ,
और सहीफे और रौशन किताब
ले कर(184)हर जान को मौत का जाइका
चखना है, और क्यामत के दिन
तुम्हारे अजर पूरे पूरे मिलेंगे, फिर
जो कोई दोज़ख़ से दूर किया गया
और जन्नत में दाखिल किया गया
पस वह मुराद को पहुँचा, और
दुनिया की ज़िन्दगी कुछ नहीं एक
धोके के सौदे के सिवा।(185)तुम अपने मालों और अपनी जानों
में ज़रूर आजमाए जाओगे, और
तुम ज़रूर सुनोगे उन लोगों से
जिन्हें तुम से पहले किताब दी गई
और मुश्रिकों से भी दुख देने
वाली बातें बहुत सी, और अगर
तुम सब्र करो और परहेजगारी
करो तो बेशक यह बड़े हिम्मत के
कामों में से है।(186)और याद करो जब अल्लाह ने
अहले किताब से अहद लिया कि
तुम उसे लोगों के लिए जरूर
बयान करना और न उसे छुपाना,
उन्होंने उसे अपनी पीठ पीछे फेंक दिया और उस के बदले थोड़ी
कीमत हासिल की, तो कितना बुरा
है जो वह ख़रीदते हैं!(187)आप हरगिज़ न समझें जो लोग
खुश होते हैं जो उन्होंने किया अपने किए पर और चाहते हैं कि उस पर उन की तारीफ
की जाए जो उन्होंने नहीं किया,पस आप(स)उन्हें रिहा शुदा न
समझें अज़ाब से, और उन के लिए
दर्दनाक अजाब है।(188)और अल्लाह के लिए है बादशाहत
आस्मानों की और ज़मीन की,
और अल्लाह हर शै पर कादिर है।(189)बेशक पैदाइश में आस्मानों की
और ज़मीन की, और रात दिन के
आने जाने में अक्ल वालों के लिए
निशानियां हैं।(190)
जो लोग अल्लाह को खड़े और बैठे
और अपनी करवटों पर याद करते
हैं, और गौर करते हैं आस्मानों की और ज़मीन की पैदाइश में, ऐ हमारे रब! तू ने यह बेमकसद पैदा नहीं किया, तू पाक है, तू बचा ले हमें दोजख के अज़ाब से।(191)ऐ हमारे रब! तू ने जिस को दोजख़ में दाखिल किया तो जरूर तू ने
उस को रुसवा किया, और जालिमों
का कोई मददगार नहीं।(192)ऐ हमारे रब! बेशक हम ने एक
पुकारने वाले को सुना जो ईमान
की तरफ पुकारता है कि अपने रब
पर ईमान ले आओ, सो हम ईमान
लाए, ऐ हमारे रब! तो हमें बख्श
दे हमारे गुनाह, और हम से हमारी
बुराइयां दूर कर दे, और हमें नेकों
के साथ मौत दे।(193)ऐ हमारे रब! और हमें दे जो तू
ने अपने रसूलों के ज़रीए हम से
वादा किया और हमें कियामत
के दिन रुसवा न कर, बेशक
तू नहीं खिलाफ करता अपना
वादा।(194)पस उन के रब ने उन की दुआ कुबूल की कि में किसी मेहनत
करने वाले की मेहनत जाया नहीं करता तुम में से मर्द हो या औरत, तुम आपस में(एक हो), सो जिन लोगों ने हिज़त की और अपने शहरों से निकाले गए, और मैरी राह में सताए गए और लड़े और मारे गए, में उन की बुराइयां उन
से जरूर दूर करूँगा और उन्हें बाग़ात में दाखिल करूँगा, बहती हैं
जिन के नीचे नहरें,यह अल्लाह
की तरफ से सवाब है, और अल्लाह
के पास अच्छा सवाब है।(195)शहरों में काफिरों का चलना फिरना
आप(स) को धोका न दे।(196)यह थोड़ा सा फाइदा है, फिर उनका ठिकाना दोज़ख़ है, और वह कितनी बुरी आराम गाह है।(197)जौ लोग अपने रब से डरते रहे उन के लिए बाग़ात हैं जिन के नीचे नहरें बहती हैं, वह उस में हमेशा
रहेंगे, मेहमानी है अल्लाह के पास
से, और जो अल्लाह के पास है नेक
लोगों के लिए बेहतर है।(198)और बेशक अहले किताब में से बाज वह हैं जो ईमान लाए हैं अल्लाह पर और जो तुम्हारी तरफ नाजिल किया गया और जो उन की तरफ नाजिल किया गया, अल्लाह के आगे आजिज़ी करते हैं, अल्लाह की आयतों के बदले थोड़ा मोल नहीं लेते, यही लोग हैं उन के लिए उन के रब के पास अजर है,
बेशक अल्लाह जलद हिसाब लेने वाला है।(199)ऐ ईमान वालो! तुम सब्र करो,
और मुकाबले में मज़बूत रहो, और
जंग की तैयारी करो, और अल्लाह
से डरो, ताकि तुम मुराद को
पहुँचो।(200)
Comments
Post a Comment