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02.सुरह बकर

 

"अलिफ-लाम-मीम(1)यह किताब है इस में कोई शक नहीं, परहेज़गारों के लिए हिदायत,(2)जो गैब पर ईमान लाते हैं,और काइम करते हैं नमाज़ और जो कुछ हम ने उन्हें दिया उस में से खर्च करते हैं,(3)और जो लोग उस पर ईमान रखते हैं जो आप (स)पर नाजिल किया गया और जो आप (स)से पहले नाजिल किया गया और वह आखिरत पर यकीन रखते हैं।(4)वही लोग अपने रब की तरफ से हिदायत पर हैं, और वही लोग कामयाब हैं।(5)बेशक जिन लोगों ने कुफ्र किया,उन पर बराबर है आप(स)उन्हें डराएं या न डराएं वह ईमान नहीं लाएंगे।(6)अल्लाह ने उन के दिलों पर और उन के कानों पर मुहर लगा दी।और उन की आँखों पर पर्दा है। और उन के लिए बड़ा अज़ाब है।(7)और कुछ लोग हैं जो कहते हैं हम ईमान लाए अल्लाह पर और आखिरत के दिन पर और वह ईमान वाले नहीं।(8)वह धोका देते हैं अल्लाह को और ईमान वालों को, हालांकि वह नहीं धोका देते मगर अपने आप को, और वह नहीं समझते।(9)उन के दिलों में बीमारी है,सो अल्लाह ने उन की बीमारी बढ़ा दी, और उन के लिए दर्दनाक अज़ाब है| क्योंकि वह झूट बोलते हैं।(10)"

 

"और जब उन्हें कहा जाता है कि ज़मीन मैं फसाद न फैलाओ तो कहते हैं कि हम सिर्फ इसलाह करने वाले हैं।(11)सुन रखो बेशक वही लोग फसाद करने वाले हैं और लेकिन नहीं समझते।(12)और जब उन्हें कहा जाता है तुम ईमान लाओ जैसे लोग ईमान लाए तो वह कहते हैं क्या हम ईमान लाएं जैसे बेवकूफ ईमान लाए? सुन रखो खूद वही बेवकूफ हैं लेकिन वह जानते नहीं(13)और जब उन लोगों से मिलते हैं जो ईमान लाए तो कहते हैं हम ईमान लाए और जब अपने शैतानों के पास अकेले होते हैं तो कहते हैं हम तुम्हारे साथ हैं, हम तो महज मज़ाक करते हैं।(14)अल्लाह उन से मज़ाक करता है और उन को उन की सरकशी मैं बढ़ाता है, वह अन्धे हो रहे हैं।(15)ये वो लोग हैं जिन्होंने हिदायत के बदले गुमराही मौल ली, तो उन की तिजारत ने कोई फाइदा न दिया, और न वह हिदायत पाने वाले थे।(16)उन की मिसाल उस शख्स जैसी है जिस ने आग भड़काई, फिर आग ने उस का इर्द गिर्द रौशन कर दिया तो अल्लाह ने छीन ली उन की रौशनी और उन्हें अन्धेरों में छोड़ दिया वह नहीं देखते।(17)वह बहरे गूँगे और अन्धे हैं सो वह नहीं लौटेंगे।(18)या जैसे आस्मान से बारिश हो, उस में अन्धेरे हो और गरज और बिजली की चमक, वह अपने कानों में अपनी उनगलियां ठॉस लेते हैं कड़क के सबब मौत के डर से| और अल्लाह काफिरों को घेरे हुए है।(19)करीब है कि बिजली उन की निगाहेँ उचक ले, जब भी वह उन पर चमकी वह उस मैं चल पड़े और जब उन पर अन्धेरा हुआ वह खड़े हो गए और अगर अल्लाह चाहता तो छीन लेता उन की शुनवाई और उन की आँखें, बेशक अल्लाह हर चीज़ पर कादिर है।(20)"

 

"ऐ लोगो! तुम अपने रब की इबादत करो जिस ने तुम्हें पैदा किया और उन लोगों को जो तुम से पहले हुए ताकि तुम परहेजगार हो जाओ।(21)जिस ने तुम्हारे लिए ज़मीन को फर्श बनाया और आस्मान को छत, और आस्मान से पानी उतारा, फिर उस के जरीए फल निकाले तुम्हारे लिए रिजक, सो अल्लाह के लिए कोई शरीक न ठहराओ और तुम जानते हो।(22)और अगर तुम्हें इस(कलाम)में शक हो जो हम ने अपने बन्दे पर उतारा तो इस जैसी एक सूरत ले आओ, और बुला लो अपने मददगार अल्लाह के सिवा अगर तुम सच्चे हो।(23)फिर अगर तुम न कर सको और हरगिज न कर सकोगे तो उस आग से डरो जिस का इंधन इन्सान और पत्थर हैं, काफिरों के लिए तैयार की गई है।(24)और उन लोगों को खुशख़बरी दो जो ईमान लाए और उन्हों ने नेक अमल किए उन के लिए बाग़ात हैं जिन के नीचे नहरें बहती हैं, जब भी उन्हें उस से कोई फल खाने को दिया जाएगा वह कहेंगे यह वही है जो हमें इस से पहले खाने को दिया गया हालांकि उन्हें उस से मिलता जुलता दिया गया, और उन के लिए उस में बीवियां हैं पाकीजा, और वह उस में हमेशा रहेंगे।(25)बेशक अल्लाह नहीं शर्माता कि कोई मिसाल बयान करे जो मच्छर जैसी हो ख़ाह उस के ऊपर(बढ़ कर)सो जो लोग ईमान लाए वह तो जानते हैं कि वह उन के रब की तरफ से हक है, और जिन लोगों ने कुफ्र किया वह कहते हैं अल्लाह ने इस मिसाल से क्याम इरादा किया, वह इस से बहुत लोगों को गुमराह करता है और इस से बहुत लोगों को हिदायत देता है, और इस से नाफरमानों के सिवा किसी को गुमराह नहीं करता,(26)जो लोग अल्लाह का अहद तोड़ते हैं उस से पुख्ता इकरार करने के बाद, और उस को काटते हैं जिस का अल्लाह ने हुक्म दिया था कि वह उसे जोड़े रखें और वह जमीन में फसाद फैलाते हैं, वही लोग नुक्सान उठाने वाले हैं।(27)तुम किस तरह अल्लाह का कुफ्र करते हो, और तुम बेजान थे सो उस ने तुम्हें जिन्दगी बख़शी, फिर वह तुम्हें मारेगा फिर तुम्हें जिलाएगा फिर उस की तरफ लौटाए जाओगे।(28)वही है जिस ने तुम्हारे लिए पैदा किया जो जमीन में है सब का सब, फिर उस ने आस्मान की तरफ कुसद किया, फिर उन को ठीक बना दिया सात आस्मान, और वह हर चीज़ का जानने वाला है।(29)जब तुम्हारे रब ने फ्रिश्तों से कहा कि मैं ज़मीन में एक नाइब बनाने वाला हूँ, उन्हों ने कहा क्या तू उस मैं बनाएगा जो उस मेँ फ्साद करेगा और खून बहाएगा? और हम तेरी तारीफ के साथ तुझ को बे ऐब कहते हैं और तेरी पाकीज़गी बयान करते हैं, उस ने कहा बेशक मैं जानता हूँ जो तुम नहीं जानते।(30)"

 

"और उस ने आदम(अ)को सब चीज़ों के नाम सिखाए, फिर उन्हें फ्रिश्तों के सामने किया, फिर कहा मुझ को उन के नाम बतलाओं अगर तुम सच्चे हो।(31)उन्हों ने कहा, तू पाक है, हमें कोई इल्म नहीं मगर(सिर्फ वह)जो तू ने हमें सिखा दिया, बेशक तू ही जानने वाला हिक्मत वाला है।(32)उस ने फरमाया ऐ आदम! उन्हें उन के नाम बतला दे, सो जब उस ने उन के नाम बतलाए उस ने फरमाया क्या मैं ने नहीं कहा था कि मैं जानता हूँ छुपी हुई बातें आस्मानों और ज़मीन की और मैं जानता हूँ जो तुम जाहिर करते हो और जो तुम छुपाते हो।(33)और जब हम ने फरीश्तों को कहा तुम आदम को सिजदा करो तो इबलीस के सिवाए उन्हों ने सिजदा किया, उस ने इनकार किया और तकब्बुर किया और वह काफिरों में से हो गया।(34)और हम ने कहा ऐ आदम! तुम रहो और तुम्हारी बीवी जन्नत मैं, और तुम दोनों उस मैं से खाओ जहां से चाहो इत्‌मिनान से, और न करीब जाना उस दरखूत के(वरना)तुम हो जाओगे जालिमों में से।(35)फिर शैतान ने उन दॉनों को फुसलाया उस से। फिर उन्हें निकलवा दिया उस हालत से जिस में वह थे, और हम ने कहा तुम उतर जाओ, तुम्हारे बाज, बाज के दुश्‌मन हैं, और तुम्हारे लिए जमीन  में ठिकाना है और एक वक़्त तक सामाने(ज़िन्दगी)है।(36)फिर आदम(अ)ने हासिल कर लिए अपने रब से कुछ कलिमात, फिर उस ने उस(आदम)की तौबा कुबूल की, बेशक वह तौबा कुबूल करने वाला रहम करने वाला है।(37)हम ने कहा तुम सब यहां से उतर जाओ, पस जब तुम्हें मेरी तरफ से कोई हिदायत पहुँचे, सो जो चला मैरी हिदायत पर, न उन पर कोई खौफ होगा न वह ग़मगीन होंगे।(38)और जिन लोगों ने कुफ्र किया और झुटलाया हमारी आयतों को, वही दोजख वाले हैं, वह हमेशा उस में रहेंगे।(39)ऐ बनी इस्राईल(औलादे याकूब)! मैरी नेमत याद करो जो मैं ने तुम्हें बखशी और पूरा करो मेरे साथ किया गया अहद, मैं तुम्हारे साथ किया गया अहद पूरा करूँगा, और मुझ ही से डरो।(40)"

 

"और उस पर ईमान लाओ जो मैं ने नाजिल किया, उस की तसदीक करने वाला जो तुम्हारे पास है, और सब से पहले उस के काफिर न हो जाओ और मैरी आयात के इवज थोड़ी कीमत न लो, और मुझ ही से डरो।(41)और न मिलाओ हक को बातिल और हक को न छुपाओ जब कि तुम जानते हो।(42)और तुम काइम करो नमाज़ और अदा करो ज़कात और रुकूअ करो रुकूअ करने वालों के साथ।(43)क्या तुम लोगों को नेकी का हुक्म देते हो और अपने आप को भूल जाते हो? हालांकि तुम पढ़ते हो किताब, क्या फिर तुम समझते नहीं।(44)और तुम मदद हासिल करो सब्र और नमाज़ से, और वह बड़ी (दुशवार)है मगर आजिज़ी करने वालों पर(नहीं)(45)वह जो समझते हैं कि वह अपने रब के रूबरू होने वाले हैं और यह कि वह उस की तरफ लौटने वाले हैं।(46)ऐ बनी इस्राईल(औलादे याकूब)! तुम मैरी नेमत याद करो जो मैं ने तुम्हें बख्शी और यह कि मैं ने तुम्हें फजीलत दी ज़माने वालों पर।(47)और उस दिन से डरो जिस दिन कोई शख्स किसी का कुछ बदला न बनेगा, और न उस से कोई सिफारिश कबूल की जाएगी, और न उस से कोई मुआवजा लिया जाएगा, और न उन की मदद की जाएगी।(48)और जब हम नें तुम्हें आले फिरऔन से रिहाई दी, वह तुम्हें दुख देते थे बुरा अज़ाब| और वह तुम्हारे बेटों को जुबह करते थे और तुम्हारी औरतों को जिन्दा छोड़ देते थे, और उस में तुम्हारे रब की तरफ से बड़ी आजमाइश थी।(49)और जब हम नें तुम्हारे लिए फाड़ दिया दरिया, फिर हम ने तुम्हें बचा लिया और आले फिरऔन को डुबो  दिया, और तुम देख रहे थे।(50)"

 

"और जब हम ने मूसा(अ)से चालीस रातों का वादा किया, फिर तुम ने बछड़े को उन के बाद(माबूद)बना लिया, और तुम ज़ालिम हुए।(51)फिर हम ने तुम्हें उस के बाद माफ कर दिया ताकि तुम एहसान मानो।(52)और जब हम ने मूसा को किताब दी और कसौटी(हक और बातिल के दरमियान फरक करने वाला)ताकि तुम हिदायत पा लो।(53)और जब मूसा(अ)ने अपनी कौम से कहा, ऐ कौम! बेशक तुम ने अपने ऊपर जुल्म किया बछड़े को (माबूद)बना कर, सौ तुम अपने पैदा करने वाले की तरफ रुजूअ करो, अपनों को हलाक करो, यह तुम्हारे लिए बेहतर है तुम्हारे पैदा करने वाले के नज़दीक, सो उस  ने तुम्हारी तौबा कुबूल कर ली, बेशक वह तौबा कुबूल करने वाला रहम करने वाला है।(54)और जब तुम ने कहा ऐ मूसा! हम तुझे हरगिज़ न मानेंगे जब तक अल्लाह को हम खुल्लम खुल्ला न देख लें, फिर तुम्हें बिजली की कड़क ने आ लिया, और तुम देख रहे थे।(55)फिर हम ने तुम्हें तुम्हारी मौत के बाद जिन्दा किया ताकि तुम एहसान मानो।(56)और हम ने तुम पर बादल का साया किया और हम ने तुम पर मनन और सलबा उतारा, वह पाक चीज़ें खाओ जो हम ने तुम्हें दीं। और उन्हों ने हम पर जुल्म नहीं किया और लेकिन वह अपनी जानो पर जुल्म करते थे।(57)जब हम ने कहा तुम दाखिल हो जाओ उस बस्ती मैं, फिर उस मैं जहां से चाहो बाफरागत खाओ और दरवाज़े से दाख़िल हो सिजदा करते हुए, और कहो बखश दे तुम्हें तुम्हारी ख़ताएं बखश दें और अनकरीब जियादा देंगे नेकी करने वालों को।(58)फिर जालिमों ने दूसरी बात से उस बात को बदल डाला जो कही गई थी उन्हें, फिर हम ने ज़ालिमों पर आस्मान से उतारा, क्योंकि वह नाफरमानी करते थे।(59)और जब मूसा(अ)ने अपनी कौम के लिए पानी मांगा, फिर हम ने कहा अपना असा पत्थर पर मारो, तो फूट पड़े उस से बारह चश्मे, हर कबीले ने अपना घाट जान लिया, तुम खाओ और पियो अल्लाह के रिजक्‌ से, और ज़मीन मैं न फिरो फसाद मचाते।(60)"

 

"और जब तुम ने कहा ऐ मूसा! हम एक खाने पर हरगिज़ सब्र न करेंगे, आप हमारे लिए अपने रब से दुआ करें कि हमारे लिए निकाले जो जमीन उगाती है, कुछ तरकारी और ककड़ी और गन्दुम और मसूर और प्याज| उस ने कहा क्या तुम बदलना चाहते हो? वह जो अदना है उस से जो बेहतर है, तुम शहर मैं उतरो बेशक तुम्हारे लिए होगा जो तुम मांगते हो, और उन पर जिललत और मोहताजी डाल दी गई, और वह लौटे अल्लाह के ग़ज़ब के साथ, यह इस लिए हुआ कि वह अल्लाह की आयतों का इनकार करते थे और नाहकु नबियां को कत्ल करते थे, यह इस लिए हुआ कि उन्हों ने नाफरमानी की और वह हद से बढ़ते थे।(61)बेशक जो लोग ईमान लाए और जो यहूदी हुए और नसरानी और साबी, जो ईमान लाए अल्लाह पर और रोज़े आखिरत पर और नेक अमल करे तो उन के लिए उन के रब के पास उन का अजर है,और उन पर न कोई खौफ होगा और न वह ग़मगीन होंगे।(62)और जब हम ने तुम से इक्रार लिया, और हम ने तुम्हारे ऊपर कोहे तूर उठाया, जो हम ने तुम्हें दिया है वह मजबूती से पकड़ो, और जो उस में है उसे याद रखो ताकि तुम परहेजगार हो जाओ।(63)फिर उस के बाद तुम फिर गए, पस अगर अल्लाह का फज़्ल न होता तुम पर और उस की रहमत तो तुम नुकसान उठाने वालों में से थे।(64)और अलबत्ता तुम ने(उन लोगों को)जान लिया जिन्हों ने तुम मैं से हफ्ते के दिन में जियादती की, तब हम ने उन से कहा तुम ज़लील बन्दर हो जाओ।(65)फिर हम ने उसे सामने वालों के लिए और पीछे आने वालों के लिए इब्रत बनाया और नसीहत परहेजगारों के लिए।(66)और जब मूसा(अ)ने अपनी कौम से कहा बेशक अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है कि तुम एक गाय जुबह करो, वह कहने लगे क्या तुम हम से मज़ाक करते हो? उस ने कहा मैं अल्लाह की पनाह लेता हूँ(इस से)कि मैं जाहिलों से हो जाऊँ।(67)उन्हों ने कहा अपने रब से हमारे लिए दुआ करें कि वह हमें बतलाए वह कैसी है? उस ने कहा बेशक वह फ्रमाता है कि वह गाय न बूढ़ी है और न छोटी उम्र की, उस के दरमियान जवान है, पस तुम्हें जो हुक्म दिया जाता है करो।(68)उन्हों ने कहा हमारे लिए दुआ करें अपने रब से कि वह हमें बतला दे,रंग कैसा है? उस ने कहा बेशक वह फ्रमाता है कि वह एक गाय है जर्द रगं की,उस का रंग खूब गहरा है, देखने वालों को अच्छी लगती है।(69)हमारे लिए अपने रब से दुआ करें वह हमें बतला दे वह कैसी है? क्योंकि गाय में हम पर इश्तिबाह हो गया, और अगर अल्लाह ने चाहा तो बेशक हम ज़रूर हिदायत पा लेंगे।(70)"

 

"उस ने कहा बेशक वह फ्रमाता है कि वह एक गाय है न सधी हो, न जमीन जोतती न खेती को पानी देती, बे ऐब है, उस में कोई दाग नहीं, वह बोले अब तुम ठीक बात लाए, फिर उन्हों ने उसे जुबह किया, और वह लगते न थे कि वह (जुबह)करें|(71)और जब तुम ने एक आदमी को कत्ल किया फिर तुम उस में झगड़ने लगे और अल्लाह जाहिर करने वाला था जो तुम छुपाते थे।(72)फिर हम ने कहा तुम उस(मकतूल)को गाय का एक टुकड़ा मारो, इस तरह अल्लाह मुर्दों को जिन्दा करेगा, वह तुम्हें दिखाता है अपनी निशानियां ताकि तुम गौर करो।(73)फिर उस के बाद तुम्हारे दिल सख्त हो गए, सो वह पत्थर जैसे हो गए या उस से जियादा सख्त, और बेशक बाज पत्थरों से नहरें फूट निकलती हैं, और बेशक उन में से बाज फट जाते हैं तो निकलता है उन से पानी, और उन में से बाज अल्लाह के डर से गिर पड़ते हैं, और अल्लाह उस से बेख़बर नहीं जो तुम करते हो।(74)फिर क्यात तुम तबक॒को रखते हो? कि वह मान लेंगे तुम्हारी ख़ातिर, और उन मैं से एक फरीक अल्लाह का कलाम सुनता है फिर वह उस को बदल डालते हैं उस को समझ लेने के बाद, और वह जानते हैं।(75)और जब वह उन लोगों से मिलते हैं जो ईमान लाए तो कहते हैं हम ईमान लाए, और जब उन के बाज दूसरों के पास अकेले होते हैं तो कहते हैं क्या तुम उन्हें वह बतलाते हो जो अल्लाह ने तुम पर जाहिर किया ताकि वह उस के जरीए तुम्हारे रब के सामने हुज्जत लाएं तुम पर,तो क्या  तुम नहीं समझते।(76)क्या वह नहीं जानते कि अल्लाह जानता है जो वह छुपाते हैं और जो वह जाहिर करते हैं।(77)और उन में कुछ अनपढ़ हैं जो किताब नहीं जानते सिवाए चन्द आर्जुओं के, और वह सिर्फ गुमान से काम लेते हैं।(78)सो उन के लिए ख़राबी है जो वह किताब लिखते हैं अपने हाथों से, फिर कहते हैं यह अल्लाह के पास से है ताकि उस के ज़रीए हासिल कर लें थोड़ी सी कीमत, सो उन के लिए ख़राबी है उस से जो उन के हाथों ने लिखा, और उन के लिए ख़राबी है उस से जो वह कमाते हैं।(79)और उन्हों ने कहा कि हमें आग हरगिज़ न छुएगी सिवाए गिनती के चन्द दिन, कह दो, क्या़ तुम ने अल्लाह के पास से कोई वादा लिया है कि अल्लाह हरगिज़ अपने बादे के खिलाफ नहीं करेगा या तुम अल्लाह पर वह कहते हो जो तुम नहीं जानते!(80)"

 

"क्यों नहीं! जिस ने कमाई कोई बुराई और उस को उस की ख़ताओं ने घेर लिया पस यही लोग दोजख़ी है, वह उस में हमेशा रहेंगे।(81)और जो लोग ईमान लाए और उन्हों ने अच्छे अमल किए यही लोग जन्नत वाले हैं, वह उस में हमैशा रहेंगे।(82)और जब हम ने लिया बनी इस्राईल से पुख्ता अहद कि तुम अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करना, और माँ बाप से हुस्ने सुलूक करना, और कराबतदारों, यतीमों और मिस्कीनों से| और तुम कहना लोगों से अच्छी बात, और नमाज़ काइम करना और ज़कात देना, फिर तुम फिर गए तुम मैं से चन्द एक के सिवा, और तुम फिर जाने वाले हो।(83)और फिर जब हम ने तुम से पुख्ता अहद लिया कि तुम अपनों के खून न बहाओगे और न तुम अपनों को अपनी बसतियों से निकालोगे,फिर तुम ने इकरार किया और तुम  गवाह हो।(84)फिर तुम वह लोग हो जो कत्ल करते हो अपनों को, और अपने एक फरीक को उन के वतन से निकालते हो, तुम चढ़ाई करते हो उन पर गुनाह और सरकशी से, और अगर वह तुम्हारे पास कैदी आएं तो बदला दे कर उन्हें छुड़ाते हो, हालांकि उन का निकालना तुम पर हराम किया गया था,तो क्या तुम किताब के बाज हिस्से पर ईमान लाते हो और बाज हिस्से का इनकार करते हो? सो तुम मैं जो ऐसा करे उस की क्यात सजा है? सिवाए इस के कि दुनिया की जिन्दगी में रुसवाई और वह कयामत के दिन सख्त अज़ाब की तरफ लौटाए जाएंगे, और जो तुम करते हो अल्लाह उस से बेखबर नहीं।(85)यही लोग हैं जिन््हों  ने खरीद ली आख़िरत के बदले दुनिया की जिन्दगी, सो उन से अज़ाब हलका न किया जाएगा, और न वह मदद किए जाएंगे।(86)और अलबत्ता हम ने मूसा(अ)को किताब दी, और हम ने उस के बाद पै दर पै भेजे रसूल, और हम ने मरयम के बेटे ईसा(अ)को खुली निशानियां दीं और उस की मदद की जिबाईल(अ)के जरीए, क्या फिर जब तुम्हारे पास कोई रसूल उस के साथ आया जो तुम्हारे नफ्स न चाहते थे तो तुम ने तकब्बुर किया, सो एक गिरोह को तुम ने झुटलाया और एक गिरोह को तुम कत्ल करने लगे।(87)और उन्हों ने कहा हमारे दिल पर्दे मैं हैं, बलकि उन पर उन के कुफ्र के सबब अल्लाह की लानत है, सो थोड़े हैं जो ईमान लाते हैं।(88)जब उन के पास अल्लाह की तरफ से किताब आई, उस की तसदीक करने वाली जो उन के पास है और वह इस से पहले काफिरों पर फतह मांगते थे, सो जब उन के पास वह आया जो वह पहचानते थे वह उस के मुन्‌किर हो गए, सो काफिरों पर अल्लाह की लानत।(89)बुरा है जिस के बदले उन्हों ने अपने आप को बेच डालो कि वह उस के मुन्‌किर हो गए जो अल्लाह ने नाजिल किया इस जिद से कि अल्लाह नाजिल करता है अपने फज्ल से अपने जिस बन्दे पर वह चाहता है, सो कमा लाए ग़ज़ब पर ग़ज़ब, और काफिरों के लिए रुसवा करने वाला अज़ाब है।(90)"

 

"और जब उन से कहा जाता है कि तुम ईमान लाओ उस पर जो अल्लाह ने नाजिल किया तो कहते हैं हम उस पर ईमान लाते हैं जो हम पर नाजिल किया गया और इनकार करते हैं उस का जो उस के अलावा है, हालांकि वह हक है,उस की तसदीक करने वाला जो उन के पास है, आप कह दें सो क्यों तुम अल्लाह के नबियों को इस से पहले कत्ल करते रहे हो! अगर तुम मोमिन हो।(91)और अलबत्ता मूसा(आ)तुम्हारे पास खुली निशानियों के साथ आए, फिर तुम ने उस के बाद बछड़े को(माबूद)बना लिया और तुम जालिम हो।(92)और जब हम ने तुम से पुख्ता अहद लिया और तुम्हारे ऊपर कोहे तूर बुलन्द किया(और कहा)जो हम ने तुम्हें दिया है मजबूती से पकड़ो और सुनो, तो वह बोले हम ने सुना और नाफ्रमानी की, और उन के दिलों मैं बछड़ा रचा दिया गया उन के कुफ्र के सबब, कह दें क्या ही बुरा है जिस का तुम्हें हुक्म देता है तुम्हारा ईमान, अगर तुम मोमिन हो।(93)कह दें अगर तुम्हारे लिए है आख़िरत का घर अल्लाह के पास ख़ास तौर पर दूसरे लोगों के सिवा, तो तुम मौत की आरजू करो अगर तुम सच्चे हो।(94)और वह हरगिज़ कभी मौत की आरजू न करेंगे उस के सबब जो उन के हाथों ने आगे भेजा, और अल्लाह जालिमों को जानने वाला है।(95)और अलबत्ता तुम उन्हें दूसरे लोगों से जियादा ज़िन्दगी पर हरीस पाओगे, और मुश्रिकों से(भी ज़ियादा), उन मैं से हर एक चाहता है काश वह हज़ार साल की उम्र पाए, और इतनी उम्र दिया जाना उसे अजाब से दूर करने वाला नहीं, और अल्लाह देखने वाला है जो वह करते हैं।(96)कह दें जो जिब्रील(अ)का दुश्मन हो तो बेशक उस ने यह आप के दिल पर नाजिल किया है अल्लाह के हुक्म से, उस की तसदीक करने वाला जो इस से पहले है, और हिदायत और खुशख़बरी ईमान वालों के लिए।(97)जौ दुश्मन हो अल्लाह का और उस के फ्रिश्तों और उस के रसूलों का और जिब्रील और मिकाईल का, तो बेशक अल्लाह काफिरों का दुश्मन है।(98)और अलबत्ता हम ने आप(स)की तरफ वाज़ेह निशानियां उतारीं और उन का इनकार सिर्फ नाफरमान करते हैं।(99)क्या(ऐसा नहीं)जब भी उन्हों कोई अहद किया तो उस को तौड़ दिया उन मैं से एक फरीक ने, बलकि उन के अक्सर ईमान नहीं रखते|(100)"

 

 

 

"और जब उन के पास एक रसूल आया अल्लाह की तरफ से, उस की तसदीक करने वाला जौ उन के पास है, तो फेंक दिया एक फरीक ने अहले किताब के, अल्लाह की किताब को अपनी पीठ पीछे, गोया कि वह जानते ही नहीं।(101)उन्हों ने उस की पैरवी की जो शैतान सुलेमान(अ)की बादशाहत में पढ़ते थे। और कुफ्र नहीं किया सुलेमान(अ)ने लेकिन शैतानों ने कुफ्र किया, वह लोगों को जादू सिखाते, और जो बाबिल मैं हारूत और मारूत दो फ्रिश्तों पर नाजिल किया गया, और वह न सिखाते किसी को यहां तक कि कह देते हम तो सिर्फ आजमाइश हैं पस तू कुफर न कर, सो वह सीखते उन दोनों से वह कुछ जिस से ख़ाविन्द और उस की बीवी के दरमियान जुदाई डालते, और वह नुक्सान पहुँचाने वाले नहीं उस से किसी को मगर अल्लाह के हुक्म से, और वह सीखते जो उन्हें नुकुसान पहुँचाए और उन्हें नफा न दे, और अलबत्ता वह जान चुके थे कि जिस ने यह ख़रीदा उस के लिए आखिरत मेँ कोई हिस्सा नहीं, और अलबत्ता बुरा है जिस के बदले उन्हों अपने आप को बेच दिया| काश वह जानते होते।(102)और अगर वह ईमान ले आते और परहेजगार बन जाते तो अल्लाह के पास अच्छा बदला पाते, काश वह जानते होते।(103)ऐ लोगो जो ईमान लाए हो (मोमिनों )! राइना न कहो और उनजुरना(हमारी तरफ तवज्जह फ्रमाइए)कहो और सुनो, और काफिरों के लिए दर्दनाक अजाब है।(104)अहले किताब मैं से जिन लोगों ने कुफ़र किया वह नहीं चाहते और न मुश्रिक कि तुम पर तुम्हारे रब की तरफ से कोई भलाई नाजिल की जाए और अल्लाह जिसे चाहता है अपनी रहमत से ख़ास कर लेता है और अल्लाह बड़े फज़्ल वाला है।(105)आयत जिसे हम मनसूख करते हैं या उसे हम भुला देते हैं उस से बेहतर या उस जैसी ले आते हैं, क्या तू नहीं जानता कि अल्लाह हर पर कादिर है।(106)क्या तू नहीं जानता कि अल्लाह के लिए है आस्मानों और ज़मीन की बादशाहत, और तुम्हारे लिए नहीं अल्लाह के सिवा कोई हामी और न मददगार।(107)क्या तुम चाहते हो कि अपने रसूल से सवाल करो जैसे सवाल किए गए इस से पहले मूसा(अ)से और जौ ईमान के बदले कुफ़र इखतियार कर ले सो वह भटक गया सीधे रास्ते से।(108)बहुत से अहले किताब ने चाहा कि वह काश तुम्हें लौटा दें तुम्हारे ईमान के बाद कुफ़र मैं, अपने दिल के हसद की वजह से, उस के बाद जब कि उन पर हक वाज़ेह हो गया, पस तुम माफ कर दो और दरगुज़र करो यहां तक कि अल्लाह अपना हुक्म लाए, बेशक अल्लाह हर चीज़ पर कादिर है।(109)और नमाज़ काइम करो और देते रहो ज़कात, और अपने लिए जो भलाई आगे भेजोगे तुम उसे पा लोगे अल्लाह के पास, बेशक तुम जो कुछ करते हो अल्लाह उसे देखने वाला है।(110)"

 

और उन्होंने कहा हरगिज़ दाखिल न होगा जन्नत मैं सिवाए उस के जो यहूदी हो या नसरानी, यह उन की झूटी आर्जूएं हैं, कह दीजिए तुम लाओ अपनी दलील अगर तुम सच्चे हो।(111)क्यों नहीं? जिस ने अपना चेहरा अल्लाह के लिए झुका दिया और वह नेकोकार हो तो उस के लिए उस का अजर उस के रब के पास है, और उन पर कोई खौफ नहीं और न वह ग़मगीन होंगे।(112)और यहूद ने कहा नसारा किसी चीज पर नहीं, और नसारा ने कहा यहूदी किसी चीज़ पर नहीं हालांकि वह पढ़ते हैं किताब| इसी तरह उन लोगों ने उन जैसी बात कही जो इल्म नहीं रखते, सो अल्लाह उन के दरमियान क्यामत के दिन फैसला करेगा जिस(बात)मे वह इख़तिलाफ करते थे।(113)और उस से बड़ा ज़ालिम कौन जिस ने अल्लाह की मसजिदों से रोका कि उन में अल्लाह का नाम लिया जाए, और उस की वीरानी की कोशिश की, उन लोगों के लिए (हक)न था कि वहां दाखिल होते मगर डरते हुए, उन के लिए दुनिया में रुसवाई है और उन के लिए आख़िरत में बड़ा अज़ाब है।(114)और अल्लाह के लिए है मश्रिक और मगरिब, सो जिस तरफ तुम मुँह करो उसी तरफ अल्लाह का सामना है, बेशक अल्लाह वुस्‌अत वाला, जानने वाला है।(115)और उन्हों ने कहा अल्लाह ने बेटा बना लिया है, वह पाक है, बलकि उसी के लिए है जो आस्मानों में और जमीन में है, सब उसी के ज़ेरे फरमान हैं।(116)वह पैदा करने वाला है आस्मानों का और जमीन का, और जब वह किसी काम का फैसला करता है तो उसे यही कहता है हो जा" तो वह हो जाता है।(117)और जो लोग इल्म नहीं रखते, उन्हों ने कहा अल्लाह हम से कलाम क्यों  नहीं करता या हमारे पास कोई निशानी क्यों  नहीं आती? इसी तरह इन से पहले लोगों ने इन जैसी बात कही, इन(अगले पिछले गुमराहों)के दिल एक जैसे हैं। हम ने यकीन रखने वाले लोगों के लिए निशानियां वाज़ेह कर दी हैं।(118)बेशक हम ने आप को भेजा हक के साथ, खुशख़बरी देने वाला, डराने वाला, और आप से न पूछा जाएगा दोजख वालों के बारे मैं|(119)आप से हरगिज राजी न होंगे यहूदी और न नसारा जब तक आप उन के दीन की पैरवी न करें, कह दें। बेशक अल्लाह की हिदायत वही हिदायत है, और अगर आप ने उन की ख़ाहिशात की पैरवी की उस के बाद जब कि आप के पास इल्म आ गया, आप के लिए अल्लाह से कोई हिमायत करने वाला नहीं और न मददगार।(120)

 

"हम ने जिन्हें किताब दी वह उस की तिलावत करते हैं जैसे तिलावत का हक्‌ है, वह उस पर ईमान रखते है, और जो उस का इन्कार करें वही खसारह पाने वाले हैं।(121)ऐ बनी इस्राईल! मैरी नेमत याद करो जो मैं ने तुम पर की और यह कि मैं ने तुम्हें ज़माने वालों पर फज़ीलत दी।(122)और उस दिन से डरो(जिस दिन)कोई शख्स बदला न हो सकेगा किसी शख्स का कुछ भी, और न उस से कोई मुआवजा कुबूल किया जाएगा, और न उसे कोई सिफारिश नफा देगी, और न उन की मदद की जाएगी।(123)और जब इब्राहीम(अ)को उन के रब ने चन्द बातों से आजमाया तो उन्हों नें वह पूरी कर दीं, उस ने फरमाया बेशक मैं तुम्हें लोगों का इमाम बनाने वाला हूँ, उस ने कहा और मेरी औलाद को(भी)? उस ने फरमाया मेरा अहद जालिमों को नहीं पहुँचता।(124)और जब हम नें ख़ाने कअबा को बनाया लोगों के लिए(बार बार)लौटने(इजतिमाअ)की जगह और अमन की जगह, और मुकाम इब्राहीम को नमाज की जगह बनाओ, और हम ने हुक्म दिया इब्राहीम(अ)और इस्माईल(अ)को कि वह मैरा घर पाक रखें तवाफ करने वालों और एतिकाफ करने वालों के लिए, और रुकूअ सिजदा करने वालों के लिए।(125)और जब इब्राहीम(अ)ने कहा ऐ मैरे रब! इस शहर को बना अमन वाला, और इस के रहने वालों को फलों की रोज़ी दे जो उन में से ईमान लाए अल्लाह पर और आखिरत के दिन पर, उस ने फरमाया जिस ने कुफ्र किया उस को थोड़ा सा नफा दूँगा फिर उस को मजबूर करूँगा दोजख़ के अज़ाब की तरफ, और वह लौटने की बुरी जगह है।(126)जब उठाते थे इब्राहीम(अ)और इस्माईल(अ)ख़ाने कअबा की बुनयादें(यह दुआ करते थे)ऐ हमारे परवरदिगार! हम सेकुबूल फरमा ले, बेशक तू सुनने वाला, जानने वाला है।(127)ऐ हमारे रब! और हमें अपना फरमाबरदार बना ले और हमारी औलाद में से एक अपनी फरमाबरदार उम्मत बना और हमें हज के तरीके दिखा और हमारी तौबा कुबूल फरमा, बेशक तू ही तौबा कूबूल करने वाला, रहम करने वाला है।(128)ऐ हमारे रब! और उन मैं एक रसूल भेज उन मैं से, वह उन पर तेरी आयतें पढ़े और उन्हें किताबऔर हिक्मत”(दानाई)की तालीम दें,और उन्हें पाक करे, बेशक तू ही ग़ालिब, हिक्मत वाला है।(129)और कौन है जो मुँह मोड़े इब्राहीम (अ)के दीन से? सिवाए उस के जिस ने अपने आप को बेवकूफ बनाया, और बेशक हम ने उसे दुनिया में चुन लिया। और बेशक वह आखिरत में नेकोकारों में से है।(130)"

 

"जब उस को उस के रब ने कहा तू सर झुका दे, उस ने कहा मैं ने तमाम जहानों के रब के लिए सर झुका दिया।(131)और इब्राहीम(अ)ने अपने बेटों को और याकूब(अ)ने(भी)उसी की वसीयत की, ऐ मेरे बेटों! अल्लाह ने बेशक चुन लिया है तुम्हारे लिए दीन, पस तुम हरगिज़ न मरना मगर मुसलमान।(132)क्या तुम थे मौजूद जब याकूब(अ)को मौत आई, जब उस ने अपने बेटों को कहाः मैरे बाद तुम किस की इबादत करोगे? उन्हों ने कहा हम इबादत करेंगे तेरे माबूद की, और तेरे बाप दादा इब्राहीम(अ)और इस्माईल(अ)और इसहाक (अ)के माबूदे वाहिद की, और हम उसी के फरमाबरदार हैं।(133)यह एक उम्मत थी जो गुज़र गई, उस के लिए जो उस ने कमाया और तुम्हारे लिए है जो तुम ने कमाया, और तुम से उस के बारे मैं न पूछा जाएगा जो वह करते थे।(134 उन्हों ने कहा तुम यहूदी या नसरानी हो जाओ हिदायत पा लोगे, कह दीजिए बलकि(हम पैरवी करते हैं)एक अल्लाह के हो जाने वाले इब्राहीम(अ)के दीन की और वह मुश्रिकों में से न थे।(135)कह दो हम ईमान लाए अल्लाह पर और जो हमारी तरफ नाजिल किया गया और जो नाजिल किया गया इब्राहीम(अ)और इस्माईल(अ)और इसहाक॒(अ)और याकूब(अ)और औलादे याकूब(अ)की तरफ, और जो दिया गया मूसा(अ)और ईसा(अ)को और जो दिया गया नबियों को उन के रब की तरफ से, हम उन मैं से किसी एक के दरमियान फर्क नहीं करते, और हम उसी के फरमाबरदार हैं।(136)पस अगर वह ईमान ले आएं जैसे तुम उस पर ईमान लाए हो तो वह  हिदायत पा गए, और अगर उन्हों ने मुँह फैरा तो बेशक वही जिद में हैं, पस अनकरीब उन के मुकाबिले मैं आप के लिए अल्लाह काफी होगा, और वह सुनने वाला, जानने वाला है।(137)(हम ने लिया)रंग अल्लाह का, और किस का अच्छा है रंग अल्लाह से? और हम उसी की इबादत करने वाले हैं।(138)कह दीजिए, क्या तुम हम से झगड़ते हो अल्लाह के बारे में हालांकि वही है हमारा रब और तुम्हारा रब, और हमारे लिए हमारे अमल और तुम्हारे लिए तुम्हारे अमल, और हम ख़ालिस उसी के हैं।(139) क्या तुम कहते हो कि इब्राहीम(अ)और इस्माईल(अ), और इसहाक(अ), और याकूब(अ)और औलादे याकूब(अ)यहूदी थे या नसरानी। कह दीजिए क्याह तुम ज़ियादा जानने वाले हो या अल्लाह? और कौन है बड़ा जालिम उस से जिस ने वह गवाही छुपाई जो अल्लाह की तरफ से उस के पास थी, और अल्लाह बेख़बर नहीं उस से जो तुम करते हो।(140)"

 

"यह एक उम्मत थी जो गुजर चुकी,उस के लिए है जो उस ने कमाया और तुम्हारे लिए है जो तुम ने  कमाया, और तुम से उस के बारे मैं न पूछा जाएगा जो वह करते थे।(141)अब बेवकूफ कहेगे कि मुसलमानों को किस चीज़ ने उस किबले से फेर दिया जिस पर वह थे? आप कह दें कि मश्रिक और मगरिब अल्लाह(ही)का है, वह जिस को चाहता है हिदायत देता है सीधे रास्ते की तरफ।(142)और उसी तरह हम ने तुम्हें मोअतदिल उम्मत बनाया ताकि तुम हो लोगों पर गवाह, और रसूल(स)तुम पर गवाह हों, और हम ने मुकर्रर नहीं किया था वह किबला जिस पर आप(स)थे मगर(इस लिए)कि हम मालूम कर लें कौन रसूल(स)की पैरवी करता है और कौन फिर जाता है अपनी एड़ियों पर(उलटे पावँ), और बेशक यह भारी बात थी मगर उन पर (नहीं)जिन्हें अल्लाह ने हिदायत दी और अल्लाह(ऐसा)नहीं कि तुम्हारा ईमान जाया कर दे, बेशक अल्लाह लोगों के साथ बड़ा शफीक, रहम करने वाला है।(143)हम देखते हैं बार बार आप(स)का मुँह आस्मान की तरफ फिरना, तो जरूर हम आप को उस किबले की तरफ फेर देंगे जिसे आप(स)पसन्द करते हैं, पस आप(स)अपना मुँह मसजिदे हराम(ख्राने कअबा)की तरफ फेर लें, और जहां कहीं तुम हो फेर लिया करो अपने मुँह उस की तरफ, और बेशक अहले किताब जरूर जानते हैं कि यह हक है उन के रब की तरफ से, और अल्लाह उस से बेख़बर नहीं जो वह करते है।(144)और अगर आप(स)लाएं अहले किताब के पास तमाम निशानियां वह(फिर भी)आप(स)के किबले की पैरवी न करेंगे, और न आप(स)उन के किबले की पैरवी करने वाले हैं, और उन में से कोई किसी(दूसरे)के किबले की पैरवी करने वाला नहीं, और अगर आप ने उन की ख़ाहिशात की पैरवी की उस के बाद कि आप के पास इल्म आ चुका तो अब बेशक आप बे इनसाफों में से होंगे।(145)और जिन्हें हम ने किताब दी वह उसे पहचानते हैं जैसे वह अपने बेटों को पहचानते हैं, और बेशक उन में से एक गिरोह हक को छुपाता है हालांकि वह जानते हैं।(146)यह हक है आप के रब की तरफ से, पस आप न हो जाएं शक करने वालों में से।(147)और हर एक के लिए एक सिम्त है जिस तरफ वह रुख़ करता है, पस तुम नेकियों में सबकत ले जाओ, जहां कहीं तुम होगे अल्लाह तुम्हें इकटठा कर लेगा, बेशक अल्लाह हर चीज़ पर कुदरत रखने वाला है।(148)और जहां से आप(स)निकलें, पस अपना रुख़ मसजिदे हराम की तरफ कर लें, और बेशक आप के रब(की तरफ)से यही हक है और अल्लाह उस से बेख़बर नहीं जो तुम करते हो।(149)और जहां कहीं से आप निकलें, अपना रुख़ मसूजिदे हराम की तरफ कर लें, और तुम जहां कहीं हो सो कर लो अपने रुख़ उस की तरफ,ताकि लोगों के लिए तुम पर कोई हुज्जत न रहे, सिवाए उन के जो उन मैं से बे इनसाफ हैं, सो तुम उन से न डरो, और मुझ से डरो ताकि मैं अपनी नेमत तुम पर पूरी कर दूँ, और ताकि तुम हिदायत पाओ।(150)"

 

"जैसा कि हम ने तुम में एक रसूल तुम मैं से भेजा, वह तुम पर हमारी आयतेँ पढ़ते हैं और वह तुम्हें पाक करते हैं, और तुम्हें किताब ओ हिक्मत(दानाई)सिखाते हैं, और तुम्हें वह सिखाते हैं जो तुम न थे जानते।(151)सो मुझे याद करो, मैं तुम्हें याद रखूँगा, और तुम मेरा शुक्र अदा करो और मेरी नाशुक्री न करो|(152)ऐ ईमान वालो! तुम सब्र और नमाज से मदद मांगो, बेशक अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है।(153)और जो अल्लाह की राह में मारे जाएं उन्हें मुर्दा न कहो, बलकि वह जिन्दा हैं, लेकिन तुम(उस का)शऊर नहीं रखते।(154)और हम तुम्हें जरूर आज़माएंगे कुछ खौफ से, और भूक से, और माल ओ जान और फलों के नुक्सान से, और आप(स)खुशख़बरी दें सब्र करने वालों को।(155)वह जिन्हें जब कोई मुसीबत पहुँचे तो वह कहें: हम अल्लाह के लिए हैं और हम उसी की तरफ लौटने वाले हैं।(156)यही लोग हैं जिन पर उन के रब की तरफ से इनायतें हैं और रहमत है, और यही लोग हिदायत याफ़्ता हैं।(157)बेशक सफा और मरवा अल्लाह के निशानात में से हैं, पस जो कोई ख़ाने कअबा का हज करे या उमरा तो उस पर कोई हर्ज नहीं कि उन दोनों का तवाफ करे, और जो खुशी से कोई नेकी करे तो बेशक अल्लाह कुद्रदान, जानने वाला है।(158)बेशक जो लोग छुपाते हैं जो अल्लाह ने खुली निशानियां और हिदायत नाजिल की, उस के बाद कि हम ने उसे किताब में लोगों के लिए वाज़ेह कर दिया, यही लोग हैं जिन पर अल्लाह लानत करता है, और उन पर लानत करते हैं लानत करने वाले।(159)सिवाए उन लोगों के जिन्होंने तौबा की और इसलाह की और वाजेह कर दिया, पस यही लोग हैं जिन्हें मैं माफ करता हूँ, और मैं माफ करने वाला, रहम करने वाला हूँ।(160)"

 

"बेशक जो लोग काफिर हुए और वह(काफिर)ही मर गए, यही लोग हैं जिन पर लानत है अल्लाह की और फ्रिश्तों की और तमाम लोगों की।(161)वह उस में हमेशा रहेंगे,अजाब हलका न होगा, और न उन्हें मोहलत दी जाएगी।(162)और तुम्हारा माबूद यकता माबूद है, उस के सिवा कोई इबादत के लाइक नहीं, निहायत मैहरबान, रहम करने वाला।(163)बेशक जमीन और आस्मानों की पैदाइश मैं, और रात और दिन के दलते रहने मैं, और कश्ती में जो समन्दर मेँ बहती है(उन चीज़ों के)साथ जो लोगों को नफा देती हैं, और जो अल्लाह ने आस्मानों से पानी उतारा, फिर उस से ज़मीन को जिन्दा किया उस के मरने के बाद, और उस मैं हर किस्म के जानवर फैलाए, और हवाओं के बदलने मैं, और आस्मान ओ ज़मीन के दरमियान ताबे बादलों में निशानियां हैं(उन)लोगों के लिए (जो)अक्ल वाले हैं।(164)जो लोग अल्लाह के सिवा शरीक अपनाते हैं वह उन से मुहब्बत करते हैं जैसे अल्लाह से मुहब्बत, और जो लोग ईमान लाए (उन्हें)अल्लाह की मुहब्बत सब से जियादा है, और अगर देख लें जिन्होंने जुल्म किया(उस वक़्त को)जब यह अजाब देखेंगे कि तमाम कुव्वत अल्लाह के लिए है और यह कि अल्लाह का अज़ाब सख्त है।(165)जब बेज़ार हो जाएंगे वह जिन की पैरवी की गई उन से जिन्होंने पैरवी की थी और वह अज़ाब देख लेंगे, और उन से तमाम वसाइल कट जाएंगे|(166)और वह कहेंगे जिन्होंने पैरवी की थी काश हमारे लिए दोबारा(दुनया में लौट जाना होता)तो हम उन से बेज़ारी करते जैसे उन्हों ने हम से बेजारी की, उसी तरह अल्लाह उन के अमल उन्हें हस्रतें बना कर दिखाएगा, और वह आग से निकलने वाले नहीं।(167)ऐ लोगो! खाओ उस में से जो ज़मीन  में है हलाल और पाक, और पैरवी  न करो शैतान के कदमों की, बेशक वह तुम्हारा खुला दुश्मन है।(168)वह तुम्हें हुक्म देता है सिर्फ बुराई और बेहयाई का और यह कि तुम अल्लाह(के बारे मैं)कहो जो तुम नहीं जानते।(169)और जब उन्हें कहा जाता है उस की पैरवी करो जो अल्लाह ने उतारा तो वह कहते हैं बलकि हम उस की पैरवी करेंगे जिस पर हम ने पाया अपने बाप दादा को, भला अगरचे उन के बाप दादा कुछ न समझते हों| और हिदायत याफ़्ता न हो।(170)"

 

"और जिन लोगों ने कुफ़र किया उन की मिसाल उस शख्स की हालत के मानिंद है जो उस को पुकारता है जो नहीं सुनता सिवाए पुकारने और चिल्लाने(की आवाज के), वह बहरे, गूँगे, अंधे हैं, पस वह नहीं समझते।|(171)ऐ वह लोग जो ईमान लाए हो, तुम  पाकीजा चीज़ों में से खाओ जो हम ने तुम्हें दी हैं और तुम अल्लाह का शुक्र अदा करो अगर तुम सिर्फ उस की बन्दगी करते हो।(172)दर हकीकत(हम ने)तुम पर हराम किया है मुर्दार और खून और सुव्वर का गोश्त और जिस पर अल्लाह के सिवा(किसी और का नाम)पुकारा गया, पस जो लाचार हो जाए मगर न सरकशी करने वाला हो न हद से बढ़ने वाला तो उस पर कोई गुनाह नहीं, बेशक अल्लाह बखशने वाला रहम करने वाला है।(173)बेशक जो लोग छुपाते हैं जो अल्लाह ने(बसूरत)किताब नाजिल किया और उस से वसूल करते हैं थोड़ी कीमत, यही लोग हैं जो अपने पेटों में सिर्फ आग भरते हैं और उन से बात नहीं करेगा अल्लाह क्यामत के दिन, और न उन्हें पाक करेगा, और उन के लिए दर्दनाक अजाब है।(174)यही लोग हैं जिन्होंने हिदायत के बदले गुमराही मोल ली, और मगफिरत के बदले अजाब, सो किस कद्र ज़यादा वह आग पर सब्र करने वाले हैं।(175)यह इस लिए कि अल्लाह ने हक के साथ किताब नाजिल की, और बेशक जिन लोगों ने किताब मेँ इख़तिलाफ किया वह जिद में दूर (जा पड़े हैं)।(176)नेकी यह नहीं कि तुम अपने मुँह मश्रिक या मगरिब की तरफ कर लो, मगर नेकी यह है जो ईमान लाए अल्लाह पर और यौमे आख़िरत पर और फ्रिश्तों और किताबों पर और नबियों पर, और उस(अल्लाह)की मुहब्बत पर माल दे रिशतेदारों को और यतीमों और मिस्कीनों को और मुसाफिरों को और सवाल करने वालों को और गर्दनों के आज़ाद कराने में और नमाज़ काइम करे और ज़कात अदा करे, और जब वह अहद  करें तो उसे पूरा करें, और सब्र करने वाले सख्ती मैं और तकलीफ  में और जंग के वक़्त, यही लोग सच्चे हैं, और यही लोग परहेजगार हैं।(177)ऐ ईमान वालो! तुम पर फर्ज किया गया क्सास मकतूलों(के बारे)में, आजाद के बदले आजाद, और गुलाम के बदले गुलाम, और औरत के बदले औरत, पस जिसे उस के भाई की तरफ से कुछ माफ किया जाए तो दस्तूर के मुताबिक पैरवी करे, और उसे अच्छे तरीके से अदा करे, यह तुम्हारे रब की तरफ से आसानी और रहमत है,पस जिस ने उस के बाद जियादती की तो उस के लिए दर्दनाक अज़ाब है।(178)और तुम्हारे लिए क्सास में जिन्दगी है, ऐ अक़्ल वालो! ताकि तुम परहेजगार हो जाओ।(179)तुम पर फर्ज़ किया गया है कि जब तुम में से किसी को मौत आए, अगर वह माल छोड़े तो वसीयत करे माँ बाप के लिए और रिशतेदारों के लिए दस्तूर के मुताबिक, यह लाजिम है परहेजगारों पर|(180)"

 

"फिर जो कोई उसे बदल दे उस के बाद कि उस ने उस को सुना तो उस का गुनाह सिर्फ उन लोगों पर है जिन्हों ने उसे बदला, बेशक अल्लाह सुनने वाला जानने वाला है।(181)पस जो कोई वसीयत करने वाले से तरफदारी या गुनाह का ख़ौफ करे फिर सुलह करा दे उन के दरमियान तो उस मैं कोई गुनाह नहीं, बेशक अल्लाह बखशने वाला रहम करने वाला है।(182)ऐ लोगो जो ईमान लाए हो (मौमिनो)! तुम पर रोज़े फर्ज किए गए हैं जैसे तुम से पहले लोगों पर फर्ज किए गए थे ताकि तुम परहेजगार बन जाओ।(183)गिनती के चन्द दिन हैं, पस तुम मैं से जो कोई बीमार हो या सफर पर हो तो गिनती पूरी करे बाद के दिनों में, और उन पर है जो ताकत रखते हैं एक नादार को खाना खिलाना, पस जो खुशी से कोई नेकी करे वह उस के लिए बेहतर है, और अगर तुम रोज़ा रखो तो तुम्हारे लिए बेहतर है अगर तुम जानते हो।(184)रमजान का महीना है जिस में कुरआन नाज़िल किया गया, कुरआन लोगों के लिए हिदायत है, और हिदायत की रौशन दलीलें, और फुरकान(हक को बातिल से जुदा करने वाला), पस जो तुम में से यह महीना पाए उसे चाहिए कि रोज़े रखे और जो बीमार हो या सफर पर हो वह बाद के दिनों मैं गिनती पूरी कर ले, अल्लाह तुम्हारे लिए आसानी चाहता है और दुशवारी नहीं चाहता, और ताकि तुम गिनती पूरी करो और ताकि तुम अल्लाह की बड़ाई बयान करो उस पर कि उस ने तुम्हें हिदायत दी, और ताकि तुम शुक्र अदा करो।(185)और जब मेरे बन्दे आप(स)से मेरे मुतअललिक पूछें तो मैं करीब हूँ, मैं कूबूल करता हूँ पुकारने वाले की दुआ जब वह मुझ से मांगे,पस चाहिए कि वह मैरा हुक्म मानें और मुझ पर ईमान लाएं ताकि वह हिदायत पाएं।(186) तुम्हारे लिए जाइज़ कर दिया गया रोज़े की रात में अपनी औरतों से बेपर्दा होना, वह तुम्हारे लिए लिबास हैं और तुम उन के लिए लिबास हो, अल्लाह ने जान लिया कि तुम अपने तईं ख़ियानत करते थे सो उस ने तुम को माफ कर दिया और तुम से दरगुज़र की, पस अब उन से मिलो और जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए लिख दिया है तलब करो, और खाओ और पियो यहां तक कि वाजेह हो जाए तुम्हारे लिए फज्र की सफेद धारी सियाह धारी से, फिर तुम रात तक रोज़ा पूरा करो, और उन से न मिलो जब तुम मौतकिफ हो मसूजिदों में(हालते एतिकाफ मैं), यह अल्लाह की हदें हैं, पस उन के करीब न जाओ, इसी तरह वाज़ेह करता है अल्लाह लोगों के लिए अपने हुक्म ताकि वह परहेजगार हो जाएं।(187)अपने माल आपस मैं न खाओ नाहक, और उस से हाकिमों तक (रिशवत)न पहुँचाओ ताकि तुम लोगों के माल से कोई हिस्सा खाओ गुनाह से(नाजाइज़ तौर पर)और तुम जानते हो।(188)और आप(स)से नए चाँद के बारे में पूछते हैं। आप कह दें यह (पैमाना-ए-)औकात लोगों और हज के लिए हैं, और नेकी यह नहीं कि तुम घरों में आओ उन की पुश्त से, बलकि नेक वह है जो परहेजगारी करे, और घरों में उन के दरवाजों से आओ, और अल्लाह से डरो ताकि तुम कामयाबी हासिल करो।(189)और तुम अल्लाह के रास्ते में उन से लड़ो जो तुम से लड़ते हैं और ज़ियादती न करो, बेशक अल्लाह ज़ियादती करने वालों को दोस्त नहीं रखता!(190)"

 

"और उन्हें मार डालो जहां उन्हें पाओ और उन्हें निकाल दो जहां से उन्हों ने तुम्हें निकाला और फितना कत्ल से जियादा संगीन है,और उन से मसजिदे हराम(ख़ाना ए कअबा)के पास न लड़ो यहां तक कि वह यहां तुम से लड़ें, पल अगर वह तुम से लड़ें तो तुम उन से लड़ौ, इसी तरह सजा है काफिरों की!(191)फिर अगर वह बाज आ जाएं तो बेशक अल्लाह बख़शने वाला रहम करने वाला है।(192)और तुम उन से लड़ो यहां तक कि कोई फितना न रहे और दीन अल्लाह के लिए हो जाए, पस अगर वह बाज आ जाएं तो नहीं(किसी पर)जियादती सिवाए जालिमों के|(193)हुरमत वाला महीना बदला है हुर्मत वाले महीने का, और हुर्मतों का बदला है, पस जिस ने तुम पर जियादती की तो तुम उस पर ज़ियादती करो जैसी उस ने तुम पर जियादती की, और अल्लाह से डरो और जान लो कि अल्लाह साथ है परहेजगारों के।(194)और अल्लाह की राह मे खर्च करो और(अपने आप को)अपने हाथों न डालो हलाकत में, और नेकी करो, बेशक अल्लाह नेकी करने वालों को दोस्त रखता है।(195)और पूरा करो हज और उमरा अल्लाह के लिए, फिर अगर तुम रोक दिए जाओ तो जो कुरबानी मयस्सर आए(पेश करो)और अपने सर न मुंडवाओ यहां तक कि कुरबानी अपनी जगह पहुँच जाए, फिर जो कोई तुम मैं से बीमार हो या उस के सर मैं तकलीफ हो तो वह बदला दे रोजे से या सदके से या कुरबानी से, फिर जब तुम अमन में हो तो जो फाइदा उठाए हज के साथ उमरा(मिला कर)तो उसे जो कुरबानी मयस्सर आए (देदे), फिर जो न पाए तो वह रोज़े रख ले तीन दिन हज के अय्याम में और सात जब तुम वापस आजाओ,यह दस पूरे हुए, यह उस के लिए है जिस के घर वाले मस्‌जिदे हराम में मौजूद न हों(न रहते हों)और तुम अल्लाह से डरो और जान लो कि अल्लाह सख्त अज़ाब देने वाला है।(196)हज के महीने मुकर्रर हैं, पस जिसने उन मैं हज लाजिम कर लिया तो वह न बेपर्दा हो, न गाली दे, न झगड़ा करे हज में, और तुम जो नेकी करोगे अल्लाह उसे जानता है, और तुम ज़ादेराह ले लिया करो, पस बेशक बेहतर जादे राह तकवा है, और ऐ अक़ल वालो! मुझ से डरते रहो।(197)तुम पर कोई गुनाह नहीं अगर तुम अपने रब का फज्ल तलाश करो (तिजारत करो), फिर जब तुम अरफात से लौटो तो अल्लाह को याद करो मशश्वरे हराम के नज़दीक (मुज़दलिफा मैं), और अल्लाह को याद करो जैसे उस ने तुम्हें हिदायत दी और बेशक उस से पहले तुम नावाकिफों में से थे।(198)फिर तुम लौटो जहां से लोग लौटें और अल्लाह से मगफिरत चाहो,बेशक अल्लाह बख्शने वाला, रहम करने वाला है(199)फिर जब तुम हज के मरासिम अदा कर चुको तो अल्लाह को याद करो जैसा कि तुम अपने बाप दादा को याद करते थे या उस से भी जियादा याद करो, पस कोई आदमी कहता है ऐ हमारे रब! हमें दुनिया में (भलाई)दे और उस के लिए नहीं है आखिरत मैं कुछ हिस्सा।(200)"

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03.सुरह इमरान

  अलिफ़ - लाम - मीम (1 ) अल्लाह के नाम से जो बहुत मैहरबान , रहम करने वाला है , उस के सिवा कोई माबूद नहीं , हमेशा जिन्दा ( सब का ) संभालने वाला। ( 2) उस ने आप ( स ) पर किताब उतारी हक के साथ जो उस से पहली ( किताब ) की तसदीक करती है , और उस ने तौरेत और इनजील उतारी ( 3) उस से पहले लोगों की हिदायत के लिए , और उस ने फूरकान ( हक को बातिल से जुदा करने वाला ) उतारा , बेशक जिन्होंने अल्लाह की आयतों से इनकार किया उन के लिए सख्त अज़ाब है , और अल्लाह जबरदस्त है , बदला लेने वाला। ( 4) बेशक अल्लाह पर छुपी हुई नहीं कोई चीज़ ज़मीन में और न आस्मान में ,(5) वही तो है जो तुम्हारी सूरत बनाता है माँ के रहम में जैसे वह चाहे , उस के सिवा कोई माबूद नहीं , जबरदस्त हिकमत वाला। ( 6) वही तो है जिस ने आप ( स)पर किताब नाजिल की , उस में मुहक्कम ( पुरूता)आयतें हैं वह किताब की असूल हैं , और दूसरी मुताशाबेह ( कई मअने देने वाली ) , सो वह उस से मुताशाबिहात की पैरवी करते हैं , फसाद ( गुमराही)की ग़र्ज़ से और उस का ( ग़लत)मतलब ढून्डने की ग़र्ज से , और उस का मतलब अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता , और म...